Friday, 30 January 2026

माँ

*आज का प्रेरक प्रसंग*

*मुझसे कोई गलती हुई है तो सुधारने का एक मौका दें,  मैं आप का सदैव ऋणी रहूंगा।*   
          एक शहर के अन्तरराष्ट्रीय प्रसिद्धि के विद्यालय के बगीचे में तेज धूप और गर्मी की परवाह किये बिना,बड़ी लग्न से पेड़ पौधों की काट छाट में लगा था कि, तभी विद्यालय के चपरासी की आवाज सुनाई दी, "गंगादास! तुझे प्रधानाचार्या जी तुरंत बुला रही हैं।"
           गंगादास को आखिरी पांच शब्दो में काफी तेजी महसूस हुई और उसे लगा कि कोई महत्वपूर्ण बात हुई है जिसकी वजह से प्रधानाचार्या जी ने उसे तुरंत ही बुलाया है।
          शीघ्रता से उठा, अपने हाथों को धोकर साफ किया और  चल दिया,द्रुत गति से प्रधानाचार्य के कार्यलय की ओर।
          उसे प्रधानाचार्य महोदया के कार्यालय की दूरी मीलो की लग रही थी जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। उसकी ह्र्दयगति बढ़ गई थी।  सोच रहा था कि उससे क्या गलत हो गया जो आज उसको प्रधानाचार्य महोदया ने  तुरंत ही अपने कार्यालय में आने को कहा।
            वह एक ईमानदार कर्मचारी था और अपने कार्य को पूरी निष्ठा से पूर्ण करता था पता नहीं क्या गलती हो गयी वह इसी चिंता के साथ प्रधानाचार्य के कार्यालय पहुचा......
           "मैडम क्या मैं अंदर आ जाऊ,आपने मुझे बुलाया था।"
            "हाँआओ और यह देखो" प्रधानाचार्या महोदया की आवाज में कड़की थी और उनकी उंगली एक पेपर पर इशारा कर रही थी।
             "पढ़ो इसे" प्रधानाचार्या ने आदेश दिया।
              "मैं, मैं, मैडम! मैं तो इग्लिश पढ़ना नही जानता मैडम!" गंगादास ने घबरा कर उत्तर दिया।
              *"मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ मैडम यदि कोई गलती हो गयी हो तो।* मैं आपका और विद्यालय का पहले से ही बहुत ऋणी हूँ क्योंकि आपने मेरी बिटिया को इस विद्यालय में निःशुल्क पढ़ने की इजाजत दी। मुझे कृपया एक और मौका दे मेरी कोई गलती हुई है तो सुधारने का। मैं आप का सदैव ऋणी रहूंगा।" गंगादास बिना रुके घबरा कर बोलता चला जा रहा था।
          उसे प्रधानाचार्या ने टोका "तुम बिना वजह अनुमान लगा रहे हो। थोड़ा इंतज़ार करो मैं तुम्हारी बिटिया की कक्षा- अध्यापिका को बुलाती हूँ।"
           वे पल जब तक उसकी बिटिया की कक्षा-अध्यापिका प्रधानाचार्या के कार्यालय में पहुची बहुत ही लंबे हो गए थे गंगादास के लिए। सोच रहा था कि क्या उसकी बिटिया से कोई गलती हो गयी, कहीं मैडम उसे विद्यालय से निकाल तो नही रही। उसकी चिंता और बढ़ गयी थी।
           कक्षा-अध्यापिका के पहुचते ही प्रधानाचार्या महोदया ने कहा "हमने तुम्हारी बिटिया की प्रतिभा को देखकर और परख कर ही उसे अपने विद्यालय में पढ़ने की अनुमति दी थी। अब ये मैडम इस पेपर जो लिखा है उसे पढ़कर और हिंदी में तुम्हे सुनाएगी गौर से सुनो।"
          कक्षा-अध्यापिका ने पेपर को पढ़ना शुरू करने से पहले बताया, "आज मातृ दिवस था और आज मैने कक्षा में सभी बच्चों को अपनी अपनी माँ के बारे में एक लेख लिखने को कहा, तुम्हारी बिटिया ने जो लिखा उसे सुनो।"
          उसके बाद कक्षा- अध्यापिका ने पेपर पढ़ना शुरू किया।
          'मैं एक गाँव में रहती थी, एक ऐसा गाँव जहाँ शिक्षा और चिकित्सा की सुविधाओं का आज भी अभाव है। चिकित्सक के अभाव में कितनी ही माँयें दम तोड़ देती हैं बच्चों के जन्म के समय। मेरी माँ भी उनमें से एक थी। उसने मुझे छुआ भी नहीं कि चल बसी। मेरे पिता ही वे पहले व्यक्ति थे मेरे परिवार के जिन्होंने मुझे गोद में लिया। पर सच कहूँ तो मेरे परिवार के वो अकेले व्यक्ति थे जिन्होंने मुझे गोद में उठाया था। बाकी की नजर में मैं अपनी माँ को खा गई थी। मेरे पिताजी ने मुझे माँ का प्यार दिया। मेरे दादा दादी चाहते थे कि मेरे पिताजी दुबारा विवाह करके एक पोते को इस दुनिया में लाये ताकि उनका वंश आगे चल सके। परंतु मेरे पिताजी ने उनकी एक न सुनी और दुबारा विवाह करने से मना कर दिया। इस वजह से मेरे दादा दादीजी ने उनको अपने से अलग कर दिया और पिताजी सब कुछ, जमीन, खेती बाड़ी, घर सुविधा आदि छोड़ कर मुझे साथ लेकर शहर चले आये और इसी विद्यालय में माली का कार्य करने लगे।  मुझे बहुत ही लाड़ प्यार से बड़ा करने लगे। मेरी जरूरतों पर माँ की तरह हर पल उनका ध्यान रहता है।"
          "आज मुझे समझ आता है कि वे क्यो हर उस चीज को जो मुझे पसंद थी ये कह कर खाने से मना करदेते थे कि वह उन्हें पसंद नही है क्योंकि वह आखिरी टुकड़ा होती थी। आज मुझे बड़ा होने पर उनके इस त्याग के महत्व पता चला।"
              "मेरे पिता ने अपनी क्षमताओं में मेरी हर प्रकार की सुख सुविधाओं का ध्यान रखा। और मेरे विद्यालय ने उनको यह सबसे बड़ा पुरुस्कार दिया जो मुझे यहाँ निःशुल्क पढ़ने की अनुमति मिली। उस दिन मेरे पिता की खुशी का कोई ठिकाना न था।"
             "यदि माँ, प्यार और देखभाल करने का नाम है तो मेरी माँ मेरे पिताजी है।"
               "यदि दयाभाव, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी उस परिभाषा के हिसाब से पूरी तरह मेरी माँ है।"
               "यदि त्याग, माँ को परिभाषित करता है तो मेरे पिताजी इस वर्ग में भी सर्वोच्च स्थान पर है।"
            "यदि संक्षेप में कहूँ कि प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग माँ की पहचान है तो मेरे पिताजी उस पहचान पर खरे उतरते है। और मेरे पिताजी विश्व की सबसे अच्छी माँ है।"
            आज मातृ दिवस पर मैं अपने पिताजी को शुभकामना दूंगी और कहूंगी कि आप संसार के सबसे अच्छे पालक है। बहुत गर्व से कहूंगी कि ये जो हमारे विद्यालय के परिश्रमी माली है मेरे पिता है।"
            "मैं जानती हूं कि मैं आज की लेखन परीक्षा में असफल हो जाऊंगी क्योकि मुझे माँ पर लेख लिखना था पर मैने पिता पर लिखा,पर यह बहुत ही छोटी सी कीमत होगी जो उस सब की जो मेरे पिता ने मेरे लिए किया। धन्यवाद"।
           आखरी शब्द पढ़ते पढ़ते अध्यापिका का गला भर आया था और प्रधानाचार्या के कार्यालय में शांति छा गयी थी।
           इस शांति में केवल गंगादास के सिसकने की आवाज सुनाई दे रही थी। बगीचे में धूप की गर्मी उसकी कमीज को गीला न कर सकी पर उस पेपर पर बिटिया के लिखे शब्दो ने उस कमीज को पिता के आसुंओ से गीला कर दिया था। वह केवल हाथ जोड़ कर वहाँ खड़ा था।
            उसने उस पेपर को अध्यापिका से लिया और अपने हृदय से लगाया और रो पड़ा।
              प्रधानाचार्या ने खड़े होकर उसे एक कुर्सी पर बैठाया और एक गिलास पानी दिया तथा कहा, "गंगादास तुम्हारी बिटिया को इस लेख के लिए पूरे 10/10 नम्बर दिए गए है। यह लेख मेरे अब तक के पूरे विद्यालय जीवन का सबसे अच्छा मातृ दिवस का लेख है। हम कल मातृ दिवस अपने विद्यालय में बड़े जोर शोर से मना रहे है। इस दिवस पर विद्यालय एक बहुत बड़ा कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। विद्यालय की प्रबंधक कमेटी ने आपको इस कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाने का निर्णय लिया है। यह सम्मान होगा उस प्यार, देखभाल, दयाभाव और त्याग का जो एक आदमी अपने बच्चे के पालन के लिए कर सकता है, यह सिद्ध करता है कि आपको एक औरत होना आवश्यक नहीं है एक पालक बनने के लिए। साथ ही यह अनुशंषा करता है उस विश्वाश का जो विश्वास आपकी बेटी ने आप पर दिखाया। हमे गर्व है कि संसार का सबसे अच्छा पिता हमारे विद्यालय में पढ़ने वाली बच्ची का है जैसा कि आपकी बिटिया ने अपने लेख में लिखा। गंगादास हमे गर्व है कि आप एक माली है और सच्चे अर्थों में माली की तरह न केवल विद्यालय के बगीचे के फूलों की देखभाल की बल्कि अपने इस घर के फूल को भी सदा खुशबू दार बनाकर रखा जिसकी खुशबू से हमारा विद्यालय महक उठा। तो क्या आप हमारे विद्यालय के इस मातृ दिवस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बनेगे?"
            रो पड़ा गंगादास और दौड़ कर बिटिया की कक्षा के बाहर से  आँसू भरी आँखों से निहारता रहा अपनी प्यारी बिटिया
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किसान और कलयुग


कहते हैं..

इन्सान सपना देखता है
तो वो ज़रूर पूरा होता है.

मगर
किसान के सपने
कभी पूरे नहीं होते
बड़े अरमान और कड़ी मेहनत से फसल तैयार करता है और जब तैयार हुई फसल को बेचने मंडी जाता है.

बड़ा खुश होते हुए जाता है.

बच्चों से कहता है
आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊंगा फल और मिठाई भी लाऊंगा,

पत्नी से कहता है..
तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है फटने भी लगी है आज एक साड़ी नई लेता आऊंगा ।
पत्नी:–”अरे नही जी..!”
“ये तो अभी ठीक है..!”
“आप तो अपने लिये
जूते ही लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!”

जब
किसान मंडी पहुँचता है .

ये उसकी मजबूरी है
वो अपने माल की कीमत खुद नहीं लगा पाता.

व्यापारी
उसके माल की कीमत
अपने हिसाब से तय करते हैं.

एक
साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.

एक
माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.

लेकिन किसान
अपने माल की कीमत खु़द नहीं कर पाता .

खैर..
माल बिक जाता है,
लेकिन कीमत
उसकी सोच अनुरूप नहीं मिल पाती.

माल तौलाई के बाद
जब पेमेन्ट मिलता है.

वो सोचता है
इसमें से दवाई वाले को देना है, खाद वाले को देना है, मज़दूर को देना है ,

अरे हाँ,
बिजली का बिल
भी तो जमा करना है.

सारा हिसाब
लगाने के बाद कुछ बचता ही नहीं.

वो मायूस हो
घर लौट आता है
बच्चे उसे बाहर ही इन्तज़ार करते हुए मिल जाते हैं.

“पिताजी..! पिताजी..!” कहते हुये उससे लिपट जाते हैं और पूछते हैं:-
“हमारे नये कपडे़ नहीं ला़ये..?”

पिता:–”वो क्या है बेटा..,
कि बाजार में अच्छे कपडे़ मिले ही नहीं,
दुकानदार कह रहा था
इस बार दिवाली पर अच्छे कपडे़ आयेंगे तब ले लेंगे..!”

पत्नी समझ जाती है, फसल
कम भाव में बिकी है,
वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है.

पति:–”अरे हाँ..!”
“तुम्हारी साड़ी भी नहीं ला पाया..!”

पत्नी:–”कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!”

पति:– “अरे वो तो मैं भूल ही गया..!”

पत्नी भी पति के साथ सालों से है पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है
लेकिन फिर भी पति को दिलासा देती है .

और अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती रसोई की ओर चली जाती है.

फिर अगले दिन
सुबह पूरा परिवार एक नयी उम्मीद ,
एक नई आशा एक नये सपने के साथ नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है.
….

ये कहानी
हर छोटे और मध्यम किसान की ज़िन्दगी में हर साल दोहराई जाती है
…..

हम ये नहीं कहते
कि हर बार फसल के
सही दाम नहीं मिलते,

लेकिन
जब भी कभी दाम बढ़ें, मीडिया वाले कैमरा ले के मंडी पहुच जाते हैं और खबर को दिन में दस दस बार दिखाते हैं.

कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट ले कर अपना मेकअप ठीक करती मुस्कराती हुई कहती हैं..
सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया.
………

कभी अपने बास्केट को कोने में रख कर किसी खेत में जा कर किसान की हालत तो देखिये.

वो किस तरह
फसल को पानी देता है.

१५ लीटर दवाई से भरी हुई टंकी पीठ पर लाद कर छिङ़काव करता है,

२० किलो खाद की
तगाड़ी उठा कर खेतों में घूम-घूम कर फसल को खाद देता है.

अघोषित बिजली कटौती के चलते रात-रात भर बिजली चालू होने के इन्तज़ार में जागता है.

चिलचिलाती धूप में
सिर का पसीना पैर तक बहाता है.

ज़हरीले जन्तुओं
का डर होते भी
खेतों में नंगे पैर घूमता है.
……

जिस दिन
ये वास्तविकता
आप अपनी आँखों से
देख लेंगे, उस दिन आपके
किचन में रखी हुई सब्ज़ी, प्याज़, गेहूँ, चावल, दाल, फल, मसाले, दूध
सब सस्ते लगने लगेंगे.

 एस आई भर्ती 2021

रो कौन रहा 

राजस्थान एस आई भर्ती २०२१ को माननीय राजस्थान हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है l अब इस पर लोगों की दो राय आ रही है l एक वो जो परीक्षा में बैठे नहीं , लेकिन उस पर नज़र रही है l दूसरे वो जो स्वयं या रिश्तेदार परीक्षा में बैठे l आम जनता या परीक्षा में नहीं बैठने वाले कह रहे है ,रद्द हुई तो बहुत अच्छा हुआ l दूध का दूध और पानी का पानी हो गया l युवाओ का परीक्षा में विश्वास क़ायम होगा,उनका हौसला बढ़ेगा और भविष्य में परीक्षा ईमानदारी से होगी

             दूसरे वो जो परीक्षा में बैठे,कहने को तो वो अपने को शुद्ध २४ कैरेट सोना बता रहे है लेकिन रोना उसी का रहता है जिसका कुछ गया हो या जिसको अपना भविष्य अंधकारमय लगता हो l जाना किस चीज का या तो लाखों रुपए या मौका l 

 इधर मेहनती का पैसा गया नहीं,मौके फिर आयेंगे,हौसला टूटा नहीं, आत्म विश्वास बढ़ गया कि ऐसी कालाबाजारी में पास होकर निकला तो ईमानदारी में तो हमे तिलक लगाकर बुलाया जाएगा l ----ByDR             

Saturday, 22 July 2023

शक,सम्पति विवाद और अंत

 शक,संपत्ति विवाद, और परिवार की समाप्ति


                  पूनाराम का जला हुआ घर 

जोधपुर जिले के पूना राम बेरड़ और एक अन्य दो भाई थे ओसियां कस्बे के चोराई गांव के निकट गंगानियों की ढाणी में निवास करते थे।
दोनों भाइयों में जमीन से संबंधित विवाद काफी समय से चल रहा था।
कुछ महीने पहले पप्पू राम उम्र 20 साल (पूना राम के बड़े भाई का लड़का) के भाई  की अहमदाबाद में हत्या कर दी गई(पुलिस के अनुसार उसने आत्महत्या की)
पप्पू राम को ऐसा लगता था कि यह हत्या उसके चाचा पूनाराम ने यह हत्या करवाई है और बदले की फिराक में था। इस मामले में दोनों घरों में आपस में कई बार झगड़ा हो चुका है।
19 जुलाई 2023  की रात को चार बजे पचपन वर्षीय पूनाराम,पचास साल की उस की पत्नी,चोबीस वर्षीय बहु धापू (पूनाराम के पुत्र रेनवतराम की पत्नी) और छः माह का पोता बाहर सो रहे थे की पप्पू राम परिवार के सदस्य ने चाचा, चाची,भाभी और भतीजे को कुल्हाड़ी से काट कर मार डाला।
        पूनाराम के घर के सदस्यों के जले शव 

पूना राम के दोनों बेटे हरजीराम और रेवतराम घर पर नहीं थे।
मारने के बाद चारों को घसीट कर झोंपड़े में डाल दिया गया।
चंवरे नुमा झोंपड़े में पहले सब पर केरोसिन डाला और आग लगा दी गई और सब जल कर खाक हो गये।
विभत्सनाक बात यह है कि शिशु को चूल्हे से निकाला गया।
            हत्यारा पपपुराम बेरड़ उम्र 20 साल

समाज में व्याप्त वैमनस्य की यह कहानी इंसान के मन को उद्वेलित कर देती है। धन जीवन के लिये आवश्यक है पर धन संपदा के लिये अपने ही खून को बहाना रक्त पपासुओं का काम ही हो सकता है।
आज शिक्षा से ज्यादा संस्कार की आवश्यकता है जिस से व्यक्ति संयमित और संतोषी जीवन के लिये तैयार हो सके।
हमारी हार्दिक संवेदनाएं समाज की स्माजियत के मरने पर और संस्कार विहीन संतान के जन्म पर।

ऐसी ही एक घटना मेरे गांव में दो साल पहले कायमखानी (मुस्लिम) समाज में बुधे खान के परिवार के साथ घटित हो चुकी है जिसमें सगे भाई उम्मेद खान के पुत्र शाहरुख खान ने ताया की पत्नी रहीसा बानो और भाभी आसमीन बानो को छुरी से गला रेत कर मार डाला।

Tuesday, 21 March 2023

पापा ने क्या किया ?

 *पिताजी आपने मेरे लिये किया क्या है?*👇



"अजी सुनते हो? राहूल को कम्पनी में जाकर टिफ़िन दे आओगे क्या?" 


"क्यों आज राहूल टिफ़िन लेकर नहीं गया।?" शरद राव ने पुछा। 


आज राहूल की कम्पनी के चेयरमैन आ रहे हैं, इसलिये राहूल सुबह 7 बजे ही निकल गया और इतनी सुबह खाना नहीं बन पाया था।"

"ठीक हैं। दे आता हूँ मैं।" 


शरद राव ने हाथ का पेपर रख दिया और वो कपडे बदलने के लिये कमरे में चले गये। पुष्पाबाई ने  राहत की साँस ली। 


शरद राव तैयार हुए मतलब उसके और राहूल के बीच हुआ विवाद उन्होंने नहीं सुना था। 


विवाद भी कैसा ? हमेशा की तरह राहूल का अपने पिताजी पर दोषारोपण करना और 

पुष्पाबाई का अपनी पति के पक्ष में बोलना। 


*विषय भी वही! हमारे पिताजी ने हमारे लिये क्या किया? मेरे लिये क्या किया हैं मेरे बाप ने ?*


 "माँ! मेरे मित्र के पिताजी भी शिक्षक थे, पर देखो उन्होंने कितना बडा बंगला बना लिया। नहीं तो एक ये हमारे पापा   (पिताजी)। अभी भी हम किराये के मकान में ही रह रहे हैं।" 


"राहूल, तुझे मालूम हैं कि तुम्हारे पापा  घर में बडे हैं। और दो बहनों और दो भाईयों की शादी का खर्चा भी उन्होंने उठाया था। सिवाय इसके तुम्हारी बहन की शादी का भी खर्चा उन्होंने ने ही किया था। अपने गांव की जमीन की कोर्ट कचेरी भी लगी ही रही। ये सारी जवाबदारियाँ किसने उठाई?"


"क्या उपयोग हुआ उसका? उनके भाई - बहन बंगलों में रहते हैं। कभी भी उन्होंने सोचा कि हमारे लिये जिस भाई ने इतने कष्ट उठाये उसने एक छोटा सा मकान भी नहीं बनाया, तो हम ही उन्हें एक मकान बना कर दे दें ?"


एक क्षण के लिए पुष्पाबाई की आँखें भर आईं। 


क्या बतायें अपने जन्म दिये पुत्र को *"बाप ने क्या किया मेरे लिये"* पुछ रहा हैं? 


फिर बोली  .... 

*"तुम्हारे पापा  ने अपना कर्तव्य निभाया। भाई-बहनों से कभी कोई आशा नहीं रखी। "*


राहूल मूर्खों जैसी बात करते हुए बोला — *"अच्छा वो ठीक हैं। उन्होंने हजारों बच्चों की ट्यूशन्स ली। यदि उनसे फीस ले लेते तो आज पैसो में खेल रहे होते।*


*आजकल के क्लासेस वालों को देखो। इंपोर्टेड गाड़ियों में घुमते हैं।"*


"यह तुम सच बोल रहे हो। परन्तु, तुम्हारे पापा ( पिताजी) का तत्व था, *ज्ञान दान का पैसा नहीं लेना।* 


उनके इन्हीं तत्वों के कारण उनकी कितनी प्रसिद्धि हुई। और कितने पुरस्कार मिलें। उसकी कल्पना हैं तुझे।"


ये सुनते ही राहूल एकदम नाराज हो गया। 


 "क्या चाटना हैं उन पुरस्कारों को? उन पुरस्कारों से घर थोडे ही बनते आयेगा। पडे ही धूल खाते हुए। कोई नहीं पुछता उनको।"


इतने में दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। राहूल ने दरवाजा खोला तो शरदराव खडे थे। 


पापा  ने उनका  बोलना तो नहीं सुना इस डर से राहूल का चेहरा उतर गया। परन्तु, शरद राव बिना कुछ बोले अन्दर चले गये। और वह वाद वहीं खत्म हो गया। 


 ये था पुष्पाबाई और राहूल का कल का झगड़ा, पर आज .... 

 

शरद राव ने टिफ़िन साईकिल को  अटकाया और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की राहूल की कम्पनी के लिये निकल पडे। 


7 किलोमीटर दूर कंपनी तक पहुचते - पहुंचते उनका दम फूल गया था। कम्पनी के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड ने उन्हें रोक दिया। 


 "राहूल पाटील साहब का टिफ़िन देना हैं। अन्दर जाँऊ क्या?" 


"अभी नहीं सहाब आये हुए है ।" गार्ड बोला। 


"चेयरमैन साहब आये हुए हैं। उनके साथ मिटिंग चल रही हैं। किसी भी क्षण वो मिटिंग खत्म कर आ सकते हैं। तुम बाजू में ही रहिये। चेयरमैन साहब को आप दिखना नहीं चाहिये।" 


शरद राव थोडी दूरी पर धूप में ही खडे रहे। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी। 


थोडी देर बोलते बोलते एक घंटा निकल गया। पांवों में दर्द उठने लगा था। 


इसलिये शरद राव वहीं एक तप्त पत्थर पर बैठने लगे, तभी गेट की आवाज आई। शायद मिटिंग खत्म हो गई होगी। 

 

चेयरमैन साहेब के पीछे पीछे कई   अधिकारी और उनके साथ राहूल भी बाहर आया।


उसने अपने पिताजी को वहाँ खडे देखा तो मन ही मन नाराज हो गया। 


   *चेयरमैन साहब कार का दरवाजा खोलकर बैठने ही वाले थे तो उनकी नजर शरद राव की ओर उठ गई।* 


कार में न बैठते हुए वो वैसे ही बाहर खडे रहे। 

 

"वो सामने कौन खडा हैं?" उन्होंने सिक्युरिटी गार्ड से पुछा। 


"अपने राहूल सर के पिताजी हैं। उनके लिये खाने का टिफ़िन लेकर आये हैं।" 

गार्ड ने कंपकंपाती आवाज में कहा। 


"बुलवाइये उनको।"


जो नहीं होना था वह हुआ। 


राहूल के तन से पसीने की धाराऐं बहने लगी। क्रोध और डर से उसका दिमाग सुन्न हुआ जान पडने लगा। 


गार्ड के आवाज देने पर शरद राव पास आये। 


चेयरमैन साहब आगे बढे और उनके समीप गये। 


*"आप पाटील सर हैं ना? डी. एन. हाई स्कूल में शिक्षक थे।"*


"हाँ। आप कैसे पहचानते हो मुझे?"


कुछ समझने के पहले ही चेयरमैन साहब ने शरदराव के चरण छूये। सभी अधिकारी और राहूल वो दृश्य देखकर अचंभित रह गये। 


*"सर, मैं अतिश अग्रवाल। तुम्हारा विद्यार्थी। आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे।"*


" हाँ.. हाँ.. याद आया। बाप रे बहुत बडे व्यक्ति बन गये आप तो ..." 


*चेयरमैन हँस दिये। फिर बोले, "सर आप यहाँ धूप में क्या कर रहे हैं। आईये अंदर चलते हैं। बहुत बातें करनी हैं आपसे।* 


सिक्युरिटी तुमने इन्हें अन्दर क्यों नहीं बिठाया?"


गार्ड ने शर्म से सिर नीचे झुका लिया। 


वो देखकर शरद राव ही बोले — "उनकी कोई गलती नहीं हैं। आपकी मिटिंग चल रही थी। आपको तकलीफ न हो, इसलिये मैं ही बाहर रूक गया।"


"ओके... ओके...!"


*चेयरमैन साहब ने शरद राव का हाथ अपने हाथ में लिया और उनको अपने आलीशन चेम्बर में ले गये।* 


"बैठिये सर। अपनी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए बोले।


"नहीं। नहीं। वो कुर्सी आपकी हैं।" शरद राव सकपकाते हुए बोले। 


*"सर, आपके कारण वो कुर्सी मुझे मिली हैं।*

तब पहला हक आपका हैं।"

चेयरमैन साहब ने जबरदस्ती से उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया। 

"आपको मालूम नहीं होगा पवार सर.." 


 जनरल मैनेजर की ओर देखते हुए बोले, 

"पाटिल सर नहीं होते तो आज ये कम्पनी नहीं होती और मैं मेरे पिताजी की अनाज की दुकान संभालता रहता।"


राहूल और जी. एम. दोनों आश्चर्य से उनकी ओर देखते ही रहे। 


"स्कूल समय में मैं बहुत ही डब्बू विद्यार्थी था। जैसे तैसे मुझे नवीं कक्षा तक पहूँचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लासेस में मुझे एडमिशन दिलाया गया। परन्तु मेरा ध्यान कभी पढाई में नहीं लगा। उस पर अमीर बाप की औलाद। दिन भर स्कूल में मौज मस्ती और मारपीट करना। शाम की क्लासेस से बंक मार कर मुवी देखना यही मेरा शगल था। माँ को वो सहन नहीं होता। उस समय पाटिल सर कडे अनुशासन और उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। माँ ने उनके पास मुझे पढ़ाने की विनती की। परन्तु सर के छोटे से घर में बैठने के लिए जगह ही नहीं थी। इसलिये सर ने पढ़ाने में असमर्थता दर्शाई। 


*माँ ने उनसे बहुत विनती की।* और हमारे घर आकर पढ़ाने के लिये मुँह मांगी फीस का बोला। सर ने फीस के लिये तो मना कर दिया। परन्तु अनेक प्रकार की विनती करने पर घर आकर पढ़ाने को तैयार हो गये। पहिले दिन सर आये। हमेशा की तरह मैं शैतानी करने लगा। सर ने मेरी अच्छी तरह से धुनाई कर दी। उस धुनाई का असर ऐसा हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। तुम्हें कहता हूँ राहूल, पहले हफ्ते में ही मुझे पढ़ने में रूचि जागृत हो गई। तत्पश्चात मुझे पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी सुझाई नहीं देता था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषय जो मुझे कठिन लगते थे वो अब सरल लगने लगे थे। सर कभी आते नहीं थे तो मैं व्यग्र हो जाता था। नवीं कक्षा में मैं दुसरे नम्बर पर आया। माँ-पिताजी को खुब खुशी हुई। मैं तो, जैसे हवा में उडने लगा था। दसवीं में मैंने सारी क्लासेस छोड दी और सिर्फ पाटिल सर से ही पढ़ने लगा था। और दसवीं में मेरीट में आकर मैंने सबको चौंका दिया था।" 


*"माय गुडनेस...! पर सर फिर भी आपने सर को फीस नहीं दी?"*

जनरल मैनेजर ने पुछा।  

         

"मेरे माँ - पिताजी के साथ मैं सर के घर पेढे लेकर गया। पिताजी ने सर को एक लाख रूपये का चेक दिया। सर ने वो नहीं लिया। उस समय सर क्या बोले वो मुझे आज भी याद हैं। 


सर बोले — "मैंने कुछ भी नहीं किया। आपका लडका ही बुद्धिमान हैं। मैंने सिर्फ़ उसे रास्ता बताया। और मैं ज्ञान नहीं बेचता। मैं वो दान देता हूँ। बाद में मैं सर के मार्गदर्शन में ही बारहवीं मे पुनः मेरीट में आया। बाद में बी. ई. करने के बाद अमेरिका जाकर एम. एस. किया। और अपने शहर में ही यह कम्पनी शुरु की। एक पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया। और मैं ही नहीं तो सर ने ऐसे अनेक असंख्य हीरे बनाये हैं। सर आपको कोटि कोटि प्रणाम...!!"

*चेयरमैन साहब ने अपनी आँखों में आये अश्रु रूमाल से पोंछे।* 


"परन्तु यह बात तो अदभूत ही हैं कि, बाहर शिक्षा का और ज्ञानदान का बाजार भरा पडा होकर भी सर ने एक रूपया भी न लेते हुए हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया, न केवल पढ़ाये पर उनमें पढ़ने की रूचि भी जगाई। वाह सर मान गये आपको और आपके आदर्श को।" 

शरद राव की ओर देखकर जी. एम ने कहा। 


 "अरे सर! ये व्यक्ति तत्त्वनिष्ठ हैं। पैसों, और मान सम्मान के भूखे भी नहीं हैं। विद्यार्थी का भला हो यही एक मात्र उद्देश्य था।" चेयरमैन बोले। 


*"मेरे पिताजी भी उन्हीं मे से एक। एक समय भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके बेचेंगे नहीं।"*


*ये उनके तत्व थे। जिन्दगी भर उसका पालन किया।ईमानदारी से व्यापार किया। उसका फायदा आज मेरे भाईयों को हो रहा हैं।"* 


बहुत देर तक कोई कुछ भी नहीं बोला। 


फिर चेयरमैन ने शरद राव से पुछा, - "सर आपने मकान बदल लिया या उसी मकान में हैं रहते हैं।"


*"उसी पुराने मकान में रहते हैं सर! "*

शरदराव के बदले में राहूल ने ही उत्तर दिया। 

    

*उस उत्तर में पिताजी के प्रति छिपी नाराजगी तत्पर चेयरमैन साहब की समझ में आ गई ।* 


‌"तय रहा फिर। सर आज मैं आपको गुरू दक्षिणा दे रहा हूँ। इसी शहर में मैंने कुछ फ्लैट्स ले रखे हैं। उसमें का एक थ्री बी. एच. के. का मकान आपके नाम कर रहा हूँ....."

 "क्या.?" 

शरद राव और राहूल दोनों आश्चर्य चकित रूप से बोलें। "नहीं नहीं इतनी बडी गुरू दक्षिणा नहीं चाहिये मुझे।" शरद राव आग्रहपूर्वक बोले। 


चेयरमैन साहब ने शरदराव के हाथ को अपने हाथ में लिया।  "सर, प्लीज....  ना मत करिये और मुझे माफ करें। काम की अधिकता में आपकी गुरू दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं।" 


फिर राहूल की ओर देखते हुए उन्होंने पुछ लिया, राहूल तुम्हारी शादी हो गई क्या?"


‌"नहीं सर, जम गई हैं। और जब तक रहने को अच्छा घर नहीं मिल जाता तब तक शादी नहीं हो सकती। ऐसी शर्त मेरे ससुरजी ने रखी होने से अभी तक शादी की डेट फिक्स नहीं की। तो फिर हाॅल भी बुक नहीं किया।" 


चेयरमैन ने फोन उठाया और किसी से बात करने लगे।समाधान कारक चेहरे से फोन रखकर, धीरे से बोले "अब चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे मेरीज गार्डन का काम हो गया। *"सागर लान्स"* तो मालूम ही होगा!"


"सर वह तो बहूत महंगा हैं..."


"अरे तुझे कहाँ पैसे चुकाने हैं। सर के सारे विद्यार्थी सर के लिये कुछ भी कर सकते हैं। सर के बस एक आवाज देने की बात हैं।


परन्तु सर तत्वनिष्ठ हैं, वैसा करेंगे भी नहीं। इस लान्स का मालिक भी सर का ही विद्यार्थी हैं। उसे मैंने सिर्फ बताया। सिर्फ हाॅल ही नहीं तो भोजन सहित संपूर्ण शादी का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारियाँ ली हैं उसने... वह भी स्वखुशी से। तुम केवल तारीख बताओ और सामान लेकर जाओ। 

"बहूत बहूत धन्यवाद सर।"


राहूल अत्यधिक खुशी से हाथ जोडकर बोला। *"धन्यवाद मुझे नहीं, तुम्हारे पिताश्री को दो राहूल!* ये उनकी पुण्याई हैं। और मुझे एक वचन दो राहूल! सर के अंतिम सांस तक तुम उन्हें अलग नहीं करोगे और उन्हें कोई दुख भी नहीं होने दोगे।


मुझे जब भी मालूम चला कि, तुम उन्हें दुख दे रहे होतो, न केवल इस कम्पनी से  लात मारकर भगा दुंगा परन्तु पुरे महाराष्ट्र भर के किसी भी स्थान पर नौकरी करने लायक नहीं छोडूंगा। ऐसी व्यवस्था कर दूंगा।"

चेयरमैन साहब कठोर शब्दों में बोले। 


"नहीं सर। मैं वचन देता हूँ, वैसा कुछ भी नहीं होगा।" राहूल हाथ जोडकर बोला। 


 *शाम को जब राहूल घर आया तब, शरद राव किताब पढ रहे थे। पुष्पाबाई पास ही सब्जी काट रही थी।* 


राहूल ने बैग रखी और शरद राव के पाँव पकडकर बोला — *"पापा , मुझसे गलती हो गई। मैं आपको आज तक गलत समझता रहा। मुझे पता नहीं था पापा  आप इतने बडे व्यक्तित्व लिये हो।"* 


‌शरद राव ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।


अपना लडका क्यों रो रहा हैं, पुष्पाबाई की समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु कुछ अच्छा घटित हुआ हैं।


इसलिये पिता-पुत्र में प्यार उमड रहा हैं। ये देखकर उनके नयनों से भी कुछ बूंदे गाल पर लुढक आई।


*एक विनती*

☝ *यदि पढकर कोई बात अच्छी लगे तो यह पोस्ट किसी स्नेहीजन को भेजियेगा जरूर ! खाली वक्त में हम कुछ अच्छा भी पढ़ें ।*

✍ 

*कृपया अपने पिताजी से कभी यह न कहे कि "आपने मेरे लिये किया ही क्या हैं? जो भी कमाना हो वो स्वयं अर्जित करें। जो शिक्षा और संस्कार उन्होंने तुम्हें दिये हैं वही कमाने के लिए पथप्रदर्शक रहेंगे..*✍

*मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः*


🙏👩‍👩‍👦‍👦🙏👩‍👩‍👦‍👦🙏👩‍👩‍👦‍👦🙏👩‍👩‍👦‍👦

Thursday, 16 March 2023

हर बेटी अपनी

 स्कूल प्रिंसिपल ने बहुत ही कड़े शब्दों मे जब किसान की बेटी ख़ुशी से पिछले


एक साल की स्कूल फीस मांगी ,तो ख़ुशी ने कहा मैडम मे  घर जाकर आज पिता जी से कह दूंगी , घर जाते ही बेटी ने माँ से पूछा पिता जी कहाँ है ? तो माँ ने कहा तुम्हारे पिता जी तो रात से ही  खेत मे है  बेटी दौड़ती हुई खेत मे जाती है और सारी बात अपने पिता को बताती है ! ख़ुशी का पिता बेटी को गोद मे  उठाकर प्यार करते हुए कहता है की इस बार हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है अपनी मैडम को कहना  अगले हफ्ता सारी  फीस आजाएगी, 

क्या हम मेला भी जाएंगे ?? ख़ुशी पूछती है 

हाँ हम मेला भी जाएंगे और पकोड़े, बर्फी भी खाएंगे ख़ुशी के पिता कहते है 

ख़ुशी इस बात को सुनकर नाचने लगती है और घर आते वक्त रस्ते मे अपनी सहेलियों को बताती  है की मै अपने माँ पापा के साथ मेला देखने जाउंगी,पकोड़े बर्फी भी खाउंगी  ये बात सुनकर पास ही खड़ी एक बजुर्ग कहती है ,बेटा ख़ुशी मेरे लिए क्या लाओगी मेले से ??

काकी हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है मे आपके लिए नए कपडे लाऊंगी  ख़ुशी कहती हुई घर दौड़ जाती है ! 


अगली सुबह ख़ुशी स्कूल जाकर अपनी मैडम को बताती है की मैडम इस बार हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है ,अगले हफ्ते सब फसल बिक जाएगी  और पिता जी आकर सारी फीस भर देंगें  

प्रिंसिपल : चुप करो तुम, एक साल से तुम बहाने बाजी कर रही हो 

ख़ुशी चुप चाप क्लास मे  जाकर बैठ जाती है और मेला घूमने के सपने देखने लगती है  तभी 

ओले पड़ने लगते है 

तेज बारिश आने लगती है बिजली कड़कने लगती है पेड़ ऐसे हिलते है मानो अभी गिर जाएंगे 

ख़ुशी एकदम  घबरा जाती है  

ख़ुशी की आँखों मे आंसू आने लगते है वोही डर फिर सताने लगता है डर  सब खत्म होने का , डर फसल बर्बाद होने का ,डर फीस ना दे पाने का ,स्कूल खत्म होने के बाद वो धीरे धीरे कांपती हुई घर की तरफ बढ़ने लगती है। हुआ भी ऐसा कि सभी फसल बर्बाद हो गई और खुशी स्कूल में फीस जमा नही करने के कारण ताना सुनने लगी।  

    उस छोटी सी बच्ची को मेला घुमने और बर्फी खाने का शौक मन में ही रह गया।      

छोटे किसान और मजदूरों के परिवार में जो दर्द है उसे समझने में पूरी उम्र भी गुजर जाएगी तो भी शायद वास्तविक दर्द को महसूस नही कर सकते आप।।। 

भारत के आम किसान का वास्तविक दर्द यह है।


Sunday, 25 June 2017

आतंकवाद

आतंकवाद
कहते है आतंकवाद की कोई जात और धर्म नही होता तो
             कश्मीर में आतंकवादी को शरण देने वाला देशद्रोही माना जाता है तो राजस्थान में आनंदपाल को शरण देने वाले क्या जय जय राजस्थान के भक्त सिपाही है ?

अब बारी है पारदर्शी और ईमानदार सरकार की ।
1 किसने छोड़ा ; छुड़ाया
2 किस किस के घर रहा
3 किसने शरण दी
4 कौन उसे सरकारी खबर देता
5 कितना धन है कैसे उसे जब्त किया जाए ?

Wednesday, 24 May 2017

एक सन्देश

एक आदमी ❄बर्फ बनाने वली कम्पनी में काम करता था___
एक दिन कारखाना बन्द होने से पहले अकेला फ्रिज करने वाले कमरे का चक्कर लगाने गया तो गलती से दरवाजा बंद हो गया
और वह अंदर बर्फ वाले हिस्से में फंस गया छुट्टी का वक़्त था और सब काम करने वाले लोग घर जा रहे थे
किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया की कोई अंदर फंस गया है।
वह समझ गया की दो-तीन घंटे बाद उसका शरीर बर्फ बन जाएगा अब जब मौत सामने नजर आने लगी तो
भगवान को सच्चे मन से याद करने लगा।
अपने कर्मों की क्षमा मांगने लगा और भगवान से कहा कि प्रह्लाद को तुमने अग्नि से बचाया, अहिल्या को पत्थर से नारि बनाया, शबरी के जुठे बेर खाकर उसे स्वर्ग में स्थान दिया।
प्रभु अगर मैंने जिंदगी में कोई एक काम भी मानवता व धर्म का किया है तो तूम मुझे यहाँ से बाहर निकालो।
मेरे बीवी बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उनका पेट पालने वाला इस दुनिया में सिर्फ मैं ही हूँ।
मैं पुरे जीवन आपके इस उपकार को याद रखूंगा और इतना कहते कहते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
एक घंटे ही गुजरे थे कि अचानक फ़्रीजर रूम में खट खट की आवाज हुई।
दरवाजा खुला चौकीदार भागता हुआ आया।
उस आदमी को उठाकर बाहर निकाला और  🔥 गर्म हीटर के पास ले गया।
उसकी हालत कुछ देर बाद ठीक हुई तो उसने चौकीदार से पूछा, आप अंदर कैसे आए?
चौकीदार बोला कि साहब मैं 20 साल से यहां काम कर रहा हूं। इस कारखाने में काम करते हुए हर रोज सैकड़ों मजदूर और ऑफिसर कारखाने में आते जाते हैं।
मैं देखता हूं लेकिन आप उन कुछ लोगों में से हो, जो जब भी कारखाने में आते हो तो मुझसे हंस कर *राम राम* करते हो
और हालचाल पूछते हो और निकलते हुए आपका *राम राम काका* कहना मेरी सारे दिन की थकावट दूर कर देता है।
जबकि अक्सर लोग मेरे पास से यूं गुजर जाते हैं कि जैसे मैं हूं ही नहीं।
आज हर दिनों की तरह मैंने आपका आते हुए अभिवादन तो सुना लेकिन *राम राम काका* सुनने के लिए इंतज़ार करता रहा।
जब ज्यादा देर हो गई तो मैं आपको तलाश करने चल पड़ा कि कहीं आप किसी मुश्किल में ना फंसे हो।
वह आदमी हैरान हो गया कि किसी को हंसकर *राम राम* कहने जैसे छोटे काम की वजह से आज उसकी जान बच गई।
*राम कहने से तर जाओगे*
_*आप सभी दोस्तों को दिलसे राम राम*_

Thursday, 1 September 2016

कृष्ण जन्माष्टमी

यह कान्हा गाँवो की लेडीज द्वारा बनाये गए है ।
एकदम देशी मिटटी से ।

Wednesday, 24 August 2016

मूमल महेन्द्रा

"महेन्द्र और मूमल : प्रेम में भ्रम और परिहास की त्रासदी"

महेंद्र सिंध के अमरकोट का राजा था,
मूमल जैसलमेर की लुद्रवा की राजकुमारी.

महेंद्र राजा भी नहीं, राजकुमार ही था,
क्योंकि तबतक उसके पिता राणा वीसलदेव जीवित थे.
इधर मूमल राजकुमारी होकर भी रानी बन चुकी थी.
राजकुमारी कुमारी थी और राजकुमार की सात रानियाँ.
यह राजतंत्र के लिए अप्रत्याशित नहीं था.

एक दिन महेंद्र अपने बहनोई हमीर,
जो गुजरात के राजा या राजकुमार थे,
के साथ आखेट के लिए जैसलमेर तक पहुँच गए
और हिरण के साथ लुद्रवा तक.

कहानी के युग में लुद्रवा के पास एक मरुनदी भी थी,
नाम था- काक.
हिरण ने जल में छलाँग लगा दी.
उन्हें हिरण पर ही करुणा आ गई
या कि अब हृदय का हिरण बनना लिखा था,
उसे छोड़ दिया.

क्या जाने,
प्रकृति का प्रभाव था या लुद्रवा की संस्कृति का स्वभाव ही,
हमीर और महेंद्र मंत्रमुग्ध हो गए.
मरुभूमि में हरियाली थी,
हरियाली में सौंदर्य था,
सौंदर्य में प्रीति थी.
सब में शायद मूमल की छाया या छवि थी,
अव्यक्त या अज्ञात रूप में.

तभी दृश्य के परिदृश्य में
मूमल के महल का सौंदर्य दिखा,
दोनों उस ओर बढ़ चले.
शायद मूमल ने भी किसी प्राचीर या गवाक्ष से दोनों को देख लिया,
दोनों के वेश राजोचित थे.

सेवकों से परिचय पुछवाया,
सत्कार सहित बुलवाया.
महल बहुत भव्य व भिन्न था.
फर्श दर्पण सा दिखता,
छत आकाश सा.
कहीं शेर बैठा दिखता,
तो कहीं अजगर लिपटा हुआ.

हमीर को लगा कि सब माया जगत् है,
क्या जाने कोई जादूगरनी हो,
पीछे ठिठक गए.

महेंद्र बढ़ते गए,
साहस के साथ, विस्मय के साथ.
और जब मूमल से मिले,
तो जाना कि महल और माहौल का सौंदर्य तो कुछ भी नहीं.
लोग तो कहते हैं कि
वह आईना देखती, तो काँच टूट जाता,
संगमरमर पर पाँव रखती, वह जरा मोम हो जाता.

अभिभूत होना या तो विस्मित होना है,
या अनुगृहीत होना या फिर प्रीति में होना.
महेंद्र के साथ तीनों घटित हो गए.

सिंधु की बहती धारा के देश का राजकुमार
काक की विच्छिन्न लहरों की धरती पर मुग्ध हुआ है,
यह मूमल को सुखद लगा.
वह भी मुग्ध हो गई.

जब महेंद्र अमरकोट लौटा,
तो बस वही लौटा, उसका मन नहीं.
सात रानियाँ थीं, कोई बाँध न सकी.

राज में जो सबसे तेज चलने वाला और दूर तक जाने वाला ऊँट था,
उसका नाम था- चीतल.
उसकी तब प्रसिद्धि वही थी,
जो घोड़ों में चेतक की थी.

अमरकोट से जैसलमेर की दूरी सौ कोस थी,
आज का कोई तीन सौ किलो मीटर.
कहते हैं, महेंद्र रात भर में ही वहाँ पहुँच गया,
पहुँच ही नहीं गया, बल्कि मिलकर सुबह तक लौट भी आया.
अविश्वसनीयता की सीमा तक ले जाना ही तब कहानियों को लोकगाथा बनाता था।
कहानी तो कहती है कि यह फिर रोज की कहानी बन गया।

रानियों को भनक लगी,
तो चीतल ऊँट के पैर तुड़वा दिये.
महेंद्र ने दूसरी ऊँटनी ली, नाम था टोरडी.
पर वह कुछ यूँ चली या भागी कि
जैसलमेर की जगह बाड़मेर ले गई.
बहुत भूल भटक कर रास्ता पूछ-पूछ कर
जब महेन्द्र लुद्रवा पहुंचा
तब तक रात का तीसरा पहर बीत चुका था।
मूमल उसका इंतजार कर सो चुकी थी,
उसके कक्ष में दीया जल रहा था।

उस दिन मूमल की बहन सुमल भी मेड़ी में आई थी,
दोनों की बातें करते-करते आंख लग गयी थी।
सहेलियों के साथ दोनों बहनों ने देर रात तक खेल खेले थे,
सुमल ने खेल में पुरुषों के कपड़े पहन पुरुष का अभिनय किया था
और वह बातें करती-करती पुरुष के कपड़ों में ही मूमल के पलंग पर उसके साथ सो गयी।

महेन्द्र सीढियां चढ़ जैसे ही मूमल के कक्ष में घुसा और
देखा कि मूमल तो किसी पुरुष के साथ सो रही है।
यह दृश्य देखते ही महेन्द्र को तो लगा जैसे वज्रपात हो गया हो।
उसके हाथ में पकड़ा चाबुक वही गिर पड़ा
और वह जिन पैरों से आया था
उन्हीं से चुपचाप बिना किसी को कुछ कहे वापस अमरकोट लौट आया।

सात रानियों वाला पुरुष भी स्त्री से तो एकनिष्ठता ही चाहता है,
वह तो राजा था.
सुबह आंख खुलते ही मूमल की दृष्टि जैसे ही महेन्द्र के हाथ से छूटे चाबुक पर पड़ी,
वह समझ गयी कि महेन्द्र आया था,
पर शायद किसी बात से नाराज होकर चला गया।
संदेह हुआ कि संदेह का कारण कहीं सुमल का होना सोना तो नहीं.
अँधेरे बहुतों को अँधेरे में रखते और डालते रहे हैं।

कई दिनों तक मूमल महेन्द्र का इंतजार करती रही कि
वो आएगा
और
जब आएगा तो सारी गलतफहमियाँ दूर हो जाएंगी,
पर महेन्द्र नहीं आया।

मूमल उसके वियोग में फीकी पड़ गई,
उसने श्रृंगार छोड़ दिया, भोजन छोड़ दिया,
उसकी कंचन जैसी काया काली पड़ने लगी।

उसने महेन्द्र को कई पत्र लिखे,
पर महेन्द्र की रानियों ने उस तक पहुंचने ही नहीं दी।
शायद उस जमाने में राजा से अधिक प्रभावशाली रानियाँ होती थीं.

आखिर मूमल ने एक ढोली (गायक) को बुला महेन्द्र के पास भेजा,
पर उसे भी महेन्द्र से नहीं मिलने दिया गया।
वह किसी तरह महेन्द्र के महल के पास पहुंचने में सफल हो गया और
गीत-गीत में ही मूमल की दशा और उसका संदेशा बता दिया.

महेन्द्र ने गायक को कहा कि
मूमल से कह देना, मेरा अब उससे कोई संबंध नहीं।

गायक से सारी बात सुनकर मूमल ने तत्काल अमरकोट जाने के लिए रथ तैयार करवाया ताकि वह भ्रम दूर कर सके,
अपना प्रेम पा सके.

अमरकोट में मूमल के आने का संदेश व मिलने का आग्रह पाकर महेन्द्र ने सोचा,
मूमल का इतनी दूर तक चलकर आना, वह भी अकेले,
बस प्रेम में ही संभव है.
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गलत न हो,
मुझे ही कोई गलतफहमी हो गई हो.

उसने मूमल को संदेश भिजवाया कि
वह उससे सुबह मिलने आएगा।
मूमल को इस संदेश से आशा बँधी।

प्रेमातुर मन जितना विश्वासी होता है,
प्रेमाहत मन उतना ही संदेही.
रात को महेंद्र ने सोचा कि देखें,
मूमल मुझसे कितना प्यार करती है़.

परीक्षा लेने के लिए सुबह उसने अपने सेवक को
यह सिखा कर मूमल के पास भेजा कि कहना-
राणा महेंद्र को रात में काले नाग ने डस लिया,
जिससे उनकी मृत्यु हो गयी.

सेवक ने जैसे ही यह बात सुनाई,
मूमल मर्माहत हो धरती पर गिर पड़ी
और उसके प्राण पखेरु उड़ गये.

उधर महेंद्र ने जब मूमल की मृत्यु का समाचार सुना,
वह उसी वक्त पागल हो गया
कहते हैं,
थार के रेगिस्तान में वह बहुत दिनों तक भटकता रहा
और
भटकते हुए ही प्राण त्याग दिये.

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थार के रेगिस्तान में आज भी लोकगीतों में यह प्रेमकथा गायी जाती है- बहुत भाव लिए, बहुत राग लिए.
मूमल वहाँ के लिए सौंदर्य और सरलता की अधिष्ठात्री है,
महेंद्र चूक गया।
उसने प्रेम में संदेह रखा, परीक्षा रखी,
बिना स्वयं पर संदेह किये, बिना स्वयं परीक्षा दिए,
इसलिए वह आदर्श न बन सका.

मूमल का नगर लुद्रवा (प्राचीन रुद्रपुर) कभी जैसलमेर की प्राचीन राजधानी रहा है और अब बस ध्वंसावशेष है.
जैसलमेर नगर से 14 किमी दूर इस नगर में मूमल के महल के अवशेष "मूमल की मेड़ी" के नाम से मौजूद हैं.
अमरकोट अब पाकिस्तान में उमरकोट बन चुका है।

मरुप्रदेश में सुंदर बेटी या बहू को मूमल की उपमा दी जाती है. अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मरु महोत्सव में भी हर साल मिस मूमल सौंदर्य प्रतियोगिता होती है.
वहाँ के लोकगीतों में गाई जाती मांड विधा ने अनजाने में इस गाथा को विश्व तक पहुँचा दिया है।

ढोला-मारू और महेंद्र-मूमल की कहानियों में बहुत कुछ समान है,
मारू और मूमल दोनों मरुभूमि की राजकुमारियाँ हैं,
दोनों ही के नगर आज के प्रसिद्ध शहरों जैसलमेर और बीकानेर की प्राचीन राजधानी रहे हैं,
दोनों का प्रेम दूर देश के राजकुमारों से हुआ,
दोनों में ही प्रेम का प्रारंभ प्रेयसियाँ करती हैं,
दोनों के ही प्रेमी पूर्व विवाहित हैं और उनकी रानियाँ
उनकी प्रेयसियों के पत्र और संदेश उन तक पहुंचने नहीं देतीं.
दोनों का संदेश लोकगायक लेकर जाते हैं, सुनाते हैं,
दोनों की कहानियां मांड की लोकगायन विधा में दुहराई जाती हैं,
दोनों में प्रेमीयुगल में एक के सर्पदंश की कहानी है,
दोनों में प्रेमीयुगल में एक मरने की झूठी कहानी है,
दोनों में नायिकाएँ नायकों से बेहतर सिद्ध होती हैं,
शायद दोनों का घटनाकाल या रचनाकाल भी समान हो,
पर अंतिम नियति सर्वथा भिन्न है,
ढोला-मारू सुखांत परिणति पाते हैं,
मूमल-महेंद्र दु:खांत परिणति.