Tuesday, 26 January 2016

देख कर ही सीखते है ।

एक समय एक गांव में एक बूढी विधवा,उसका बेटा,बहू और एक पोता रहते थे । बेटा रोजाना अपने काम पर निकल जाता और पोता पढ़ने चला जाता । बहू अपनी सासु माँ को मिट्टी के फूटे बर्तन से बनी प्लेट में खाना देती थी। उस बूढी माँ का न आदर था न सम्मान ।उसके नसीब में अब था बासी खाना झिड़की,ताना और धक्के ।समय पंख लगा के निकल गया ,पोता भी बड़ा हुआ उसके भी बहू आई और वह भी पिता के साथ काम पर जाने लगा ।
               उस घर के रीति रिवाज ढर्रा अभी भी सुधरा नहीं
उस बूढ़ी माँ को उसी बर्तन में खाना वही जिल्लत मिल रही थी ।छोटी बहू किसी संस्कारी पिता की औलाद थी ,वह यह दृश्य देख जाने कहाँ खो गई और एक नए संसार को देख रही थी कि मानव सभ्यता में ऐसा भी होता है ! फिर भी पिता के संस्कारों और छोटी हुँ ये सोचते हुए उसने यह चुगली(काना-फूसी) नहीँ की ।
    समय फिर गुजरता गया और बूढी माँ का स्वर्गवास हो गया ।उसका बारहवा वगरैह भी हो गया ।अब पोते की बहू और उसकी सास में प्रेम वार्ता होने लगी कि बेटा ऐसा करना ,वैसा करना और हाँ वो बूढी दादी वाला मिट्टी का टुकड़ा बाहर गली में फैंक देना । छोटी बहू बोली क्यों सासु मां तो जवाब मिला कि दादी तो चली गई अब इसमे किसे खिलाना है ?
              पोते की बहू ने मासूमियत से कहा सासु माँ कल आप भी बूढी होगी, खाट जकड़ लेगी---तब आपके यह बर्तन काम आएगा ।
    सीख---बच्चों को वो करके दीखाओ जो हम उनसे चाहते हो ।

No comments:

Post a Comment