एक समय की बात है श्री कृष्णा और अर्जुन कहीँ जा रहे थे रास्ते में उन्हें एक गरीब ब्राह्मण दिखा जो भिक्षा मांग के पेट भरता था अर्जुन को दया आ गई और दो मोहरे उस ब्राह्मण को देदी लेकिन थोड़ी देर बाद उस ब्राह्मण को चोर लूट ले जाते है ।एक दिन फिर वही ब्राह्मण भीख मांगते दीखता है तो तरस खाकर अर्जुन अबकी बार उसे एक बेशकीमती जादुई मणि देते है । ब्राह्मण उस मणि को घर में एक फूटे घड़े में रख देता है ताकि अबकी बार फिर चोर न ले जा सके लेकिन किस्मत भी ब्राह्मण का पीछा नहीँ छोड़ती है । आगे एक दिन उसकी पत्नि नदी में जल लेने जाती है और उसका घड़ा फुट गया ।वह घर आकर उस फूटे घड़े को पानी लाने ले जाती है जिसमे ब्राह्मण ने मणि रखी थी । ज्योहि जल भरने को घड़ा टेढा किया त्योंही उसमे से मणि लुढ़क जाती है और उसे मछली निगल गई । ब्राह्मण को पता चला तो खूब रोया पछताया और बेचारा फिर भीख मांगने लगा ।
अबकी बार जब उसे हरी एवम् अर्जुन ने भीख मांगते देखा तो श्री कृष्ण ने उसे दो रूपये दिए ।अर्जुन भौचकै हो कर बोले भगवन मैंने दो बार इसकी दरिद्रता दूर करने के लिए उतना कुछ दिया तब भी कोई फर्क न्ही पडा और आप मात्र दो रूपये दे रहे है इससे क्या इसकी दरिद्रता दूर होगी ।
कृष्ण ने कहा इसके पीछे जाओ और देखते जाओ अर्जुन ने ऐसा ही किया । ब्राह्मण सोचता जा रहा था कि दो रूपये से क्या होगा ;एक समय का खाना भी नही खा सकेंगे ऐसा सोचता सोचता वह नदी पर पानी पीने चला गया तभी एक मछुआरा एक मछली पकड़ झोली में डालने लगा ।ब्राह्मण को दया आ गई और दो रूपये देकर मछली को मछुआरे से आजाद करवाया ।
ब्राह्मण मछली को नदी जल में छोड़ ही रहा था कि तड़पती मछली के मुख से वही मणि गिरी ।ब्राह्मण उसे देख चिल्लाया मिल गया मिल गया । तभी वही दोनों चोर भी नदी पर जल कार्य से आये हुए थे जो मिल गया मिल गया कि आवाज से घबरा गए कि ब्राह्मण उन्हें पहचान गया और सुबह राजा से शिकायत करेगा । दोनों चोर ब्राह्मण के पैर पकड़ माफ़ी मांग कर दो मोहरे लौटा देते है ।
अर्जुन ने यह सारा नजारा देख हरि को यह कथा बताई तो श्री कृष्णा बोले -----------
धन दौलत से नसीब नही बदलता ;नसीब को सोच ही बदल सकती है ।नेकी बदल सकती है जैसे दो बार ब्राह्मण ने धन स्वार्थ किया लेकिन तीसरी बार सोचा ये कुछ नहीं है, इससे थोडा नेक काम कर लूँ ।
वही नेकी ब्राह्मण का काम कर गई ।
अबकी बार जब उसे हरी एवम् अर्जुन ने भीख मांगते देखा तो श्री कृष्ण ने उसे दो रूपये दिए ।अर्जुन भौचकै हो कर बोले भगवन मैंने दो बार इसकी दरिद्रता दूर करने के लिए उतना कुछ दिया तब भी कोई फर्क न्ही पडा और आप मात्र दो रूपये दे रहे है इससे क्या इसकी दरिद्रता दूर होगी ।
कृष्ण ने कहा इसके पीछे जाओ और देखते जाओ अर्जुन ने ऐसा ही किया । ब्राह्मण सोचता जा रहा था कि दो रूपये से क्या होगा ;एक समय का खाना भी नही खा सकेंगे ऐसा सोचता सोचता वह नदी पर पानी पीने चला गया तभी एक मछुआरा एक मछली पकड़ झोली में डालने लगा ।ब्राह्मण को दया आ गई और दो रूपये देकर मछली को मछुआरे से आजाद करवाया ।
ब्राह्मण मछली को नदी जल में छोड़ ही रहा था कि तड़पती मछली के मुख से वही मणि गिरी ।ब्राह्मण उसे देख चिल्लाया मिल गया मिल गया । तभी वही दोनों चोर भी नदी पर जल कार्य से आये हुए थे जो मिल गया मिल गया कि आवाज से घबरा गए कि ब्राह्मण उन्हें पहचान गया और सुबह राजा से शिकायत करेगा । दोनों चोर ब्राह्मण के पैर पकड़ माफ़ी मांग कर दो मोहरे लौटा देते है ।
अर्जुन ने यह सारा नजारा देख हरि को यह कथा बताई तो श्री कृष्णा बोले -----------
धन दौलत से नसीब नही बदलता ;नसीब को सोच ही बदल सकती है ।नेकी बदल सकती है जैसे दो बार ब्राह्मण ने धन स्वार्थ किया लेकिन तीसरी बार सोचा ये कुछ नहीं है, इससे थोडा नेक काम कर लूँ ।
वही नेकी ब्राह्मण का काम कर गई ।