Saturday, 6 February 2016
Thursday, 28 January 2016
श्री कृष्णा उपदेश
एक समय की बात है श्री कृष्णा और अर्जुन कहीँ जा रहे थे रास्ते में उन्हें एक गरीब ब्राह्मण दिखा जो भिक्षा मांग के पेट भरता था अर्जुन को दया आ गई और दो मोहरे उस ब्राह्मण को देदी लेकिन थोड़ी देर बाद उस ब्राह्मण को चोर लूट ले जाते है ।एक दिन फिर वही ब्राह्मण भीख मांगते दीखता है तो तरस खाकर अर्जुन अबकी बार उसे एक बेशकीमती जादुई मणि देते है । ब्राह्मण उस मणि को घर में एक फूटे घड़े में रख देता है ताकि अबकी बार फिर चोर न ले जा सके लेकिन किस्मत भी ब्राह्मण का पीछा नहीँ छोड़ती है । आगे एक दिन उसकी पत्नि नदी में जल लेने जाती है और उसका घड़ा फुट गया ।वह घर आकर उस फूटे घड़े को पानी लाने ले जाती है जिसमे ब्राह्मण ने मणि रखी थी । ज्योहि जल भरने को घड़ा टेढा किया त्योंही उसमे से मणि लुढ़क जाती है और उसे मछली निगल गई । ब्राह्मण को पता चला तो खूब रोया पछताया और बेचारा फिर भीख मांगने लगा ।
अबकी बार जब उसे हरी एवम् अर्जुन ने भीख मांगते देखा तो श्री कृष्ण ने उसे दो रूपये दिए ।अर्जुन भौचकै हो कर बोले भगवन मैंने दो बार इसकी दरिद्रता दूर करने के लिए उतना कुछ दिया तब भी कोई फर्क न्ही पडा और आप मात्र दो रूपये दे रहे है इससे क्या इसकी दरिद्रता दूर होगी ।
कृष्ण ने कहा इसके पीछे जाओ और देखते जाओ अर्जुन ने ऐसा ही किया । ब्राह्मण सोचता जा रहा था कि दो रूपये से क्या होगा ;एक समय का खाना भी नही खा सकेंगे ऐसा सोचता सोचता वह नदी पर पानी पीने चला गया तभी एक मछुआरा एक मछली पकड़ झोली में डालने लगा ।ब्राह्मण को दया आ गई और दो रूपये देकर मछली को मछुआरे से आजाद करवाया ।
ब्राह्मण मछली को नदी जल में छोड़ ही रहा था कि तड़पती मछली के मुख से वही मणि गिरी ।ब्राह्मण उसे देख चिल्लाया मिल गया मिल गया । तभी वही दोनों चोर भी नदी पर जल कार्य से आये हुए थे जो मिल गया मिल गया कि आवाज से घबरा गए कि ब्राह्मण उन्हें पहचान गया और सुबह राजा से शिकायत करेगा । दोनों चोर ब्राह्मण के पैर पकड़ माफ़ी मांग कर दो मोहरे लौटा देते है ।
अर्जुन ने यह सारा नजारा देख हरि को यह कथा बताई तो श्री कृष्णा बोले -----------
धन दौलत से नसीब नही बदलता ;नसीब को सोच ही बदल सकती है ।नेकी बदल सकती है जैसे दो बार ब्राह्मण ने धन स्वार्थ किया लेकिन तीसरी बार सोचा ये कुछ नहीं है, इससे थोडा नेक काम कर लूँ ।
वही नेकी ब्राह्मण का काम कर गई ।
अबकी बार जब उसे हरी एवम् अर्जुन ने भीख मांगते देखा तो श्री कृष्ण ने उसे दो रूपये दिए ।अर्जुन भौचकै हो कर बोले भगवन मैंने दो बार इसकी दरिद्रता दूर करने के लिए उतना कुछ दिया तब भी कोई फर्क न्ही पडा और आप मात्र दो रूपये दे रहे है इससे क्या इसकी दरिद्रता दूर होगी ।
कृष्ण ने कहा इसके पीछे जाओ और देखते जाओ अर्जुन ने ऐसा ही किया । ब्राह्मण सोचता जा रहा था कि दो रूपये से क्या होगा ;एक समय का खाना भी नही खा सकेंगे ऐसा सोचता सोचता वह नदी पर पानी पीने चला गया तभी एक मछुआरा एक मछली पकड़ झोली में डालने लगा ।ब्राह्मण को दया आ गई और दो रूपये देकर मछली को मछुआरे से आजाद करवाया ।
ब्राह्मण मछली को नदी जल में छोड़ ही रहा था कि तड़पती मछली के मुख से वही मणि गिरी ।ब्राह्मण उसे देख चिल्लाया मिल गया मिल गया । तभी वही दोनों चोर भी नदी पर जल कार्य से आये हुए थे जो मिल गया मिल गया कि आवाज से घबरा गए कि ब्राह्मण उन्हें पहचान गया और सुबह राजा से शिकायत करेगा । दोनों चोर ब्राह्मण के पैर पकड़ माफ़ी मांग कर दो मोहरे लौटा देते है ।
अर्जुन ने यह सारा नजारा देख हरि को यह कथा बताई तो श्री कृष्णा बोले -----------
धन दौलत से नसीब नही बदलता ;नसीब को सोच ही बदल सकती है ।नेकी बदल सकती है जैसे दो बार ब्राह्मण ने धन स्वार्थ किया लेकिन तीसरी बार सोचा ये कुछ नहीं है, इससे थोडा नेक काम कर लूँ ।
वही नेकी ब्राह्मण का काम कर गई ।
Tuesday, 26 January 2016
देख कर ही सीखते है ।
एक समय एक गांव में एक बूढी विधवा,उसका बेटा,बहू और एक पोता रहते थे । बेटा रोजाना अपने काम पर निकल जाता और पोता पढ़ने चला जाता । बहू अपनी सासु माँ को मिट्टी के फूटे बर्तन से बनी प्लेट में खाना देती थी। उस बूढी माँ का न आदर था न सम्मान ।उसके नसीब में अब था बासी खाना झिड़की,ताना और धक्के ।समय पंख लगा के निकल गया ,पोता भी बड़ा हुआ उसके भी बहू आई और वह भी पिता के साथ काम पर जाने लगा ।
उस घर के रीति रिवाज ढर्रा अभी भी सुधरा नहीं
उस बूढ़ी माँ को उसी बर्तन में खाना वही जिल्लत मिल रही थी ।छोटी बहू किसी संस्कारी पिता की औलाद थी ,वह यह दृश्य देख जाने कहाँ खो गई और एक नए संसार को देख रही थी कि मानव सभ्यता में ऐसा भी होता है ! फिर भी पिता के संस्कारों और छोटी हुँ ये सोचते हुए उसने यह चुगली(काना-फूसी) नहीँ की ।
समय फिर गुजरता गया और बूढी माँ का स्वर्गवास हो गया ।उसका बारहवा वगरैह भी हो गया ।अब पोते की बहू और उसकी सास में प्रेम वार्ता होने लगी कि बेटा ऐसा करना ,वैसा करना और हाँ वो बूढी दादी वाला मिट्टी का टुकड़ा बाहर गली में फैंक देना । छोटी बहू बोली क्यों सासु मां तो जवाब मिला कि दादी तो चली गई अब इसमे किसे खिलाना है ?
पोते की बहू ने मासूमियत से कहा सासु माँ कल आप भी बूढी होगी, खाट जकड़ लेगी---तब आपके यह बर्तन काम आएगा ।
सीख---बच्चों को वो करके दीखाओ जो हम उनसे चाहते हो ।
उस घर के रीति रिवाज ढर्रा अभी भी सुधरा नहीं
उस बूढ़ी माँ को उसी बर्तन में खाना वही जिल्लत मिल रही थी ।छोटी बहू किसी संस्कारी पिता की औलाद थी ,वह यह दृश्य देख जाने कहाँ खो गई और एक नए संसार को देख रही थी कि मानव सभ्यता में ऐसा भी होता है ! फिर भी पिता के संस्कारों और छोटी हुँ ये सोचते हुए उसने यह चुगली(काना-फूसी) नहीँ की ।
समय फिर गुजरता गया और बूढी माँ का स्वर्गवास हो गया ।उसका बारहवा वगरैह भी हो गया ।अब पोते की बहू और उसकी सास में प्रेम वार्ता होने लगी कि बेटा ऐसा करना ,वैसा करना और हाँ वो बूढी दादी वाला मिट्टी का टुकड़ा बाहर गली में फैंक देना । छोटी बहू बोली क्यों सासु मां तो जवाब मिला कि दादी तो चली गई अब इसमे किसे खिलाना है ?
पोते की बहू ने मासूमियत से कहा सासु माँ कल आप भी बूढी होगी, खाट जकड़ लेगी---तब आपके यह बर्तन काम आएगा ।
सीख---बच्चों को वो करके दीखाओ जो हम उनसे चाहते हो ।
तेजाजी कथा
वीर तेजाजी का जन्म 29 जनवरी 1074 को खरनाल नागौर के धौल्या जाट कुल में ताहर के घर हुआ ।माता सुगना के लाड प्यार से जब बड़े हुए तो एक दिन भाभी ने खाने को लेकर ताना मार दिया ।तेजाजी अपनी पत्नी को लेने रायमल्जी मुथा के वहाँ गांव पनेर अजमेर पहुंचे ।तभी पत्नी पेमल की सहेली लिछमा रोती हुई आई कि उसकी गायें चोर ले गए ।तेजाजी लीलण घोड़ी सवार हो गायें लेने जाते है ।रास्ते में एक काला नाग घास फूस में जल रहा था ; तेजाजी ने बाहर निकाला तो नाग बोले आज मेरे जीवन की मुक्ति हो रही थी आपने बचा कर अन्याय किया अब मुझे और कई साल धरती पे पेट रेंगते फिरना पड़ेगा । मैं नाराज हूँ आपको डचूंगा तो तेजाजी ने कहा अभी मै गायों को बचाने के पुण्य काम जा रहा हुँ।मेरा वादा है की मैं वापस आऊंगा और आप डच लेना । तेजाजी ने चोरों से गायें छुड़वाई ,वापस आए और नाग ने डच लिया । जाते जाते नाग ने भी वचन दिया कि हे महापुरुष जो मौत से भी वादा कर गया उन्हें मैं भी नमन करता हुँ और वचन देता हुँ कि भविष्य में मेरा डचा भी आपके नाम धागा मात्र बांधने से ठीक होगा ।ऐसी विचारधारा से आज तेजाजी मारवाड़ मालवा मेवात हरियाणा के लोक देवता है।
जय जय तेजाजी ।
Subscribe to:
Comments (Atom)