शक,संपत्ति विवाद, और परिवार की समाप्ति
Saturday, 22 July 2023
शक,सम्पति विवाद और अंत
Tuesday, 21 March 2023
पापा ने क्या किया ?
*पिताजी आपने मेरे लिये किया क्या है?*👇
"अजी सुनते हो? राहूल को कम्पनी में जाकर टिफ़िन दे आओगे क्या?"
"क्यों आज राहूल टिफ़िन लेकर नहीं गया।?" शरद राव ने पुछा।
आज राहूल की कम्पनी के चेयरमैन आ रहे हैं, इसलिये राहूल सुबह 7 बजे ही निकल गया और इतनी सुबह खाना नहीं बन पाया था।"
"ठीक हैं। दे आता हूँ मैं।"
शरद राव ने हाथ का पेपर रख दिया और वो कपडे बदलने के लिये कमरे में चले गये। पुष्पाबाई ने राहत की साँस ली।
शरद राव तैयार हुए मतलब उसके और राहूल के बीच हुआ विवाद उन्होंने नहीं सुना था।
विवाद भी कैसा ? हमेशा की तरह राहूल का अपने पिताजी पर दोषारोपण करना और
पुष्पाबाई का अपनी पति के पक्ष में बोलना।
*विषय भी वही! हमारे पिताजी ने हमारे लिये क्या किया? मेरे लिये क्या किया हैं मेरे बाप ने ?*
"माँ! मेरे मित्र के पिताजी भी शिक्षक थे, पर देखो उन्होंने कितना बडा बंगला बना लिया। नहीं तो एक ये हमारे पापा (पिताजी)। अभी भी हम किराये के मकान में ही रह रहे हैं।"
"राहूल, तुझे मालूम हैं कि तुम्हारे पापा घर में बडे हैं। और दो बहनों और दो भाईयों की शादी का खर्चा भी उन्होंने उठाया था। सिवाय इसके तुम्हारी बहन की शादी का भी खर्चा उन्होंने ने ही किया था। अपने गांव की जमीन की कोर्ट कचेरी भी लगी ही रही। ये सारी जवाबदारियाँ किसने उठाई?"
"क्या उपयोग हुआ उसका? उनके भाई - बहन बंगलों में रहते हैं। कभी भी उन्होंने सोचा कि हमारे लिये जिस भाई ने इतने कष्ट उठाये उसने एक छोटा सा मकान भी नहीं बनाया, तो हम ही उन्हें एक मकान बना कर दे दें ?"
एक क्षण के लिए पुष्पाबाई की आँखें भर आईं।
क्या बतायें अपने जन्म दिये पुत्र को *"बाप ने क्या किया मेरे लिये"* पुछ रहा हैं?
फिर बोली ....
*"तुम्हारे पापा ने अपना कर्तव्य निभाया। भाई-बहनों से कभी कोई आशा नहीं रखी। "*
राहूल मूर्खों जैसी बात करते हुए बोला — *"अच्छा वो ठीक हैं। उन्होंने हजारों बच्चों की ट्यूशन्स ली। यदि उनसे फीस ले लेते तो आज पैसो में खेल रहे होते।*
*आजकल के क्लासेस वालों को देखो। इंपोर्टेड गाड़ियों में घुमते हैं।"*
"यह तुम सच बोल रहे हो। परन्तु, तुम्हारे पापा ( पिताजी) का तत्व था, *ज्ञान दान का पैसा नहीं लेना।*
उनके इन्हीं तत्वों के कारण उनकी कितनी प्रसिद्धि हुई। और कितने पुरस्कार मिलें। उसकी कल्पना हैं तुझे।"
ये सुनते ही राहूल एकदम नाराज हो गया।
"क्या चाटना हैं उन पुरस्कारों को? उन पुरस्कारों से घर थोडे ही बनते आयेगा। पडे ही धूल खाते हुए। कोई नहीं पुछता उनको।"
इतने में दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। राहूल ने दरवाजा खोला तो शरदराव खडे थे।
पापा ने उनका बोलना तो नहीं सुना इस डर से राहूल का चेहरा उतर गया। परन्तु, शरद राव बिना कुछ बोले अन्दर चले गये। और वह वाद वहीं खत्म हो गया।
ये था पुष्पाबाई और राहूल का कल का झगड़ा, पर आज ....
शरद राव ने टिफ़िन साईकिल को अटकाया और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की राहूल की कम्पनी के लिये निकल पडे।
7 किलोमीटर दूर कंपनी तक पहुचते - पहुंचते उनका दम फूल गया था। कम्पनी के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड ने उन्हें रोक दिया।
"राहूल पाटील साहब का टिफ़िन देना हैं। अन्दर जाँऊ क्या?"
"अभी नहीं सहाब आये हुए है ।" गार्ड बोला।
"चेयरमैन साहब आये हुए हैं। उनके साथ मिटिंग चल रही हैं। किसी भी क्षण वो मिटिंग खत्म कर आ सकते हैं। तुम बाजू में ही रहिये। चेयरमैन साहब को आप दिखना नहीं चाहिये।"
शरद राव थोडी दूरी पर धूप में ही खडे रहे। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी।
थोडी देर बोलते बोलते एक घंटा निकल गया। पांवों में दर्द उठने लगा था।
इसलिये शरद राव वहीं एक तप्त पत्थर पर बैठने लगे, तभी गेट की आवाज आई। शायद मिटिंग खत्म हो गई होगी।
चेयरमैन साहेब के पीछे पीछे कई अधिकारी और उनके साथ राहूल भी बाहर आया।
उसने अपने पिताजी को वहाँ खडे देखा तो मन ही मन नाराज हो गया।
*चेयरमैन साहब कार का दरवाजा खोलकर बैठने ही वाले थे तो उनकी नजर शरद राव की ओर उठ गई।*
कार में न बैठते हुए वो वैसे ही बाहर खडे रहे।
"वो सामने कौन खडा हैं?" उन्होंने सिक्युरिटी गार्ड से पुछा।
"अपने राहूल सर के पिताजी हैं। उनके लिये खाने का टिफ़िन लेकर आये हैं।"
गार्ड ने कंपकंपाती आवाज में कहा।
"बुलवाइये उनको।"
जो नहीं होना था वह हुआ।
राहूल के तन से पसीने की धाराऐं बहने लगी। क्रोध और डर से उसका दिमाग सुन्न हुआ जान पडने लगा।
गार्ड के आवाज देने पर शरद राव पास आये।
चेयरमैन साहब आगे बढे और उनके समीप गये।
*"आप पाटील सर हैं ना? डी. एन. हाई स्कूल में शिक्षक थे।"*
"हाँ। आप कैसे पहचानते हो मुझे?"
कुछ समझने के पहले ही चेयरमैन साहब ने शरदराव के चरण छूये। सभी अधिकारी और राहूल वो दृश्य देखकर अचंभित रह गये।
*"सर, मैं अतिश अग्रवाल। तुम्हारा विद्यार्थी। आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे।"*
" हाँ.. हाँ.. याद आया। बाप रे बहुत बडे व्यक्ति बन गये आप तो ..."
*चेयरमैन हँस दिये। फिर बोले, "सर आप यहाँ धूप में क्या कर रहे हैं। आईये अंदर चलते हैं। बहुत बातें करनी हैं आपसे।*
सिक्युरिटी तुमने इन्हें अन्दर क्यों नहीं बिठाया?"
गार्ड ने शर्म से सिर नीचे झुका लिया।
वो देखकर शरद राव ही बोले — "उनकी कोई गलती नहीं हैं। आपकी मिटिंग चल रही थी। आपको तकलीफ न हो, इसलिये मैं ही बाहर रूक गया।"
"ओके... ओके...!"
*चेयरमैन साहब ने शरद राव का हाथ अपने हाथ में लिया और उनको अपने आलीशन चेम्बर में ले गये।*
"बैठिये सर। अपनी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए बोले।
"नहीं। नहीं। वो कुर्सी आपकी हैं।" शरद राव सकपकाते हुए बोले।
*"सर, आपके कारण वो कुर्सी मुझे मिली हैं।*
तब पहला हक आपका हैं।"
चेयरमैन साहब ने जबरदस्ती से उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया।
"आपको मालूम नहीं होगा पवार सर.."
जनरल मैनेजर की ओर देखते हुए बोले,
"पाटिल सर नहीं होते तो आज ये कम्पनी नहीं होती और मैं मेरे पिताजी की अनाज की दुकान संभालता रहता।"
राहूल और जी. एम. दोनों आश्चर्य से उनकी ओर देखते ही रहे।
"स्कूल समय में मैं बहुत ही डब्बू विद्यार्थी था। जैसे तैसे मुझे नवीं कक्षा तक पहूँचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लासेस में मुझे एडमिशन दिलाया गया। परन्तु मेरा ध्यान कभी पढाई में नहीं लगा। उस पर अमीर बाप की औलाद। दिन भर स्कूल में मौज मस्ती और मारपीट करना। शाम की क्लासेस से बंक मार कर मुवी देखना यही मेरा शगल था। माँ को वो सहन नहीं होता। उस समय पाटिल सर कडे अनुशासन और उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। माँ ने उनके पास मुझे पढ़ाने की विनती की। परन्तु सर के छोटे से घर में बैठने के लिए जगह ही नहीं थी। इसलिये सर ने पढ़ाने में असमर्थता दर्शाई।
*माँ ने उनसे बहुत विनती की।* और हमारे घर आकर पढ़ाने के लिये मुँह मांगी फीस का बोला। सर ने फीस के लिये तो मना कर दिया। परन्तु अनेक प्रकार की विनती करने पर घर आकर पढ़ाने को तैयार हो गये। पहिले दिन सर आये। हमेशा की तरह मैं शैतानी करने लगा। सर ने मेरी अच्छी तरह से धुनाई कर दी। उस धुनाई का असर ऐसा हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। तुम्हें कहता हूँ राहूल, पहले हफ्ते में ही मुझे पढ़ने में रूचि जागृत हो गई। तत्पश्चात मुझे पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी सुझाई नहीं देता था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषय जो मुझे कठिन लगते थे वो अब सरल लगने लगे थे। सर कभी आते नहीं थे तो मैं व्यग्र हो जाता था। नवीं कक्षा में मैं दुसरे नम्बर पर आया। माँ-पिताजी को खुब खुशी हुई। मैं तो, जैसे हवा में उडने लगा था। दसवीं में मैंने सारी क्लासेस छोड दी और सिर्फ पाटिल सर से ही पढ़ने लगा था। और दसवीं में मेरीट में आकर मैंने सबको चौंका दिया था।"
*"माय गुडनेस...! पर सर फिर भी आपने सर को फीस नहीं दी?"*
जनरल मैनेजर ने पुछा।
"मेरे माँ - पिताजी के साथ मैं सर के घर पेढे लेकर गया। पिताजी ने सर को एक लाख रूपये का चेक दिया। सर ने वो नहीं लिया। उस समय सर क्या बोले वो मुझे आज भी याद हैं।
सर बोले — "मैंने कुछ भी नहीं किया। आपका लडका ही बुद्धिमान हैं। मैंने सिर्फ़ उसे रास्ता बताया। और मैं ज्ञान नहीं बेचता। मैं वो दान देता हूँ। बाद में मैं सर के मार्गदर्शन में ही बारहवीं मे पुनः मेरीट में आया। बाद में बी. ई. करने के बाद अमेरिका जाकर एम. एस. किया। और अपने शहर में ही यह कम्पनी शुरु की। एक पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया। और मैं ही नहीं तो सर ने ऐसे अनेक असंख्य हीरे बनाये हैं। सर आपको कोटि कोटि प्रणाम...!!"
*चेयरमैन साहब ने अपनी आँखों में आये अश्रु रूमाल से पोंछे।*
"परन्तु यह बात तो अदभूत ही हैं कि, बाहर शिक्षा का और ज्ञानदान का बाजार भरा पडा होकर भी सर ने एक रूपया भी न लेते हुए हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया, न केवल पढ़ाये पर उनमें पढ़ने की रूचि भी जगाई। वाह सर मान गये आपको और आपके आदर्श को।"
शरद राव की ओर देखकर जी. एम ने कहा।
"अरे सर! ये व्यक्ति तत्त्वनिष्ठ हैं। पैसों, और मान सम्मान के भूखे भी नहीं हैं। विद्यार्थी का भला हो यही एक मात्र उद्देश्य था।" चेयरमैन बोले।
*"मेरे पिताजी भी उन्हीं मे से एक। एक समय भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके बेचेंगे नहीं।"*
*ये उनके तत्व थे। जिन्दगी भर उसका पालन किया।ईमानदारी से व्यापार किया। उसका फायदा आज मेरे भाईयों को हो रहा हैं।"*
बहुत देर तक कोई कुछ भी नहीं बोला।
फिर चेयरमैन ने शरद राव से पुछा, - "सर आपने मकान बदल लिया या उसी मकान में हैं रहते हैं।"
*"उसी पुराने मकान में रहते हैं सर! "*
शरदराव के बदले में राहूल ने ही उत्तर दिया।
*उस उत्तर में पिताजी के प्रति छिपी नाराजगी तत्पर चेयरमैन साहब की समझ में आ गई ।*
"तय रहा फिर। सर आज मैं आपको गुरू दक्षिणा दे रहा हूँ। इसी शहर में मैंने कुछ फ्लैट्स ले रखे हैं। उसमें का एक थ्री बी. एच. के. का मकान आपके नाम कर रहा हूँ....."
"क्या.?"
शरद राव और राहूल दोनों आश्चर्य चकित रूप से बोलें। "नहीं नहीं इतनी बडी गुरू दक्षिणा नहीं चाहिये मुझे।" शरद राव आग्रहपूर्वक बोले।
चेयरमैन साहब ने शरदराव के हाथ को अपने हाथ में लिया। "सर, प्लीज.... ना मत करिये और मुझे माफ करें। काम की अधिकता में आपकी गुरू दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं।"
फिर राहूल की ओर देखते हुए उन्होंने पुछ लिया, राहूल तुम्हारी शादी हो गई क्या?"
"नहीं सर, जम गई हैं। और जब तक रहने को अच्छा घर नहीं मिल जाता तब तक शादी नहीं हो सकती। ऐसी शर्त मेरे ससुरजी ने रखी होने से अभी तक शादी की डेट फिक्स नहीं की। तो फिर हाॅल भी बुक नहीं किया।"
चेयरमैन ने फोन उठाया और किसी से बात करने लगे।समाधान कारक चेहरे से फोन रखकर, धीरे से बोले "अब चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे मेरीज गार्डन का काम हो गया। *"सागर लान्स"* तो मालूम ही होगा!"
"सर वह तो बहूत महंगा हैं..."
"अरे तुझे कहाँ पैसे चुकाने हैं। सर के सारे विद्यार्थी सर के लिये कुछ भी कर सकते हैं। सर के बस एक आवाज देने की बात हैं।
परन्तु सर तत्वनिष्ठ हैं, वैसा करेंगे भी नहीं। इस लान्स का मालिक भी सर का ही विद्यार्थी हैं। उसे मैंने सिर्फ बताया। सिर्फ हाॅल ही नहीं तो भोजन सहित संपूर्ण शादी का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारियाँ ली हैं उसने... वह भी स्वखुशी से। तुम केवल तारीख बताओ और सामान लेकर जाओ।
"बहूत बहूत धन्यवाद सर।"
राहूल अत्यधिक खुशी से हाथ जोडकर बोला। *"धन्यवाद मुझे नहीं, तुम्हारे पिताश्री को दो राहूल!* ये उनकी पुण्याई हैं। और मुझे एक वचन दो राहूल! सर के अंतिम सांस तक तुम उन्हें अलग नहीं करोगे और उन्हें कोई दुख भी नहीं होने दोगे।
मुझे जब भी मालूम चला कि, तुम उन्हें दुख दे रहे होतो, न केवल इस कम्पनी से लात मारकर भगा दुंगा परन्तु पुरे महाराष्ट्र भर के किसी भी स्थान पर नौकरी करने लायक नहीं छोडूंगा। ऐसी व्यवस्था कर दूंगा।"
चेयरमैन साहब कठोर शब्दों में बोले।
"नहीं सर। मैं वचन देता हूँ, वैसा कुछ भी नहीं होगा।" राहूल हाथ जोडकर बोला।
*शाम को जब राहूल घर आया तब, शरद राव किताब पढ रहे थे। पुष्पाबाई पास ही सब्जी काट रही थी।*
राहूल ने बैग रखी और शरद राव के पाँव पकडकर बोला — *"पापा , मुझसे गलती हो गई। मैं आपको आज तक गलत समझता रहा। मुझे पता नहीं था पापा आप इतने बडे व्यक्तित्व लिये हो।"*
शरद राव ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।
अपना लडका क्यों रो रहा हैं, पुष्पाबाई की समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु कुछ अच्छा घटित हुआ हैं।
इसलिये पिता-पुत्र में प्यार उमड रहा हैं। ये देखकर उनके नयनों से भी कुछ बूंदे गाल पर लुढक आई।
*एक विनती*
☝ *यदि पढकर कोई बात अच्छी लगे तो यह पोस्ट किसी स्नेहीजन को भेजियेगा जरूर ! खाली वक्त में हम कुछ अच्छा भी पढ़ें ।*
✍
*कृपया अपने पिताजी से कभी यह न कहे कि "आपने मेरे लिये किया ही क्या हैं? जो भी कमाना हो वो स्वयं अर्जित करें। जो शिक्षा और संस्कार उन्होंने तुम्हें दिये हैं वही कमाने के लिए पथप्रदर्शक रहेंगे..*✍
*मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः*
🙏👩👩👦👦🙏👩👩👦👦🙏👩👩👦👦🙏👩👩👦👦
Thursday, 16 March 2023
हर बेटी अपनी
स्कूल प्रिंसिपल ने बहुत ही कड़े शब्दों मे जब किसान की बेटी ख़ुशी से पिछले
एक साल की स्कूल फीस मांगी ,तो ख़ुशी ने कहा मैडम मे घर जाकर आज पिता जी से कह दूंगी , घर जाते ही बेटी ने माँ से पूछा पिता जी कहाँ है ? तो माँ ने कहा तुम्हारे पिता जी तो रात से ही खेत मे है बेटी दौड़ती हुई खेत मे जाती है और सारी बात अपने पिता को बताती है ! ख़ुशी का पिता बेटी को गोद मे उठाकर प्यार करते हुए कहता है की इस बार हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है अपनी मैडम को कहना अगले हफ्ता सारी फीस आजाएगी,
क्या हम मेला भी जाएंगे ?? ख़ुशी पूछती है
हाँ हम मेला भी जाएंगे और पकोड़े, बर्फी भी खाएंगे ख़ुशी के पिता कहते है
ख़ुशी इस बात को सुनकर नाचने लगती है और घर आते वक्त रस्ते मे अपनी सहेलियों को बताती है की मै अपने माँ पापा के साथ मेला देखने जाउंगी,पकोड़े बर्फी भी खाउंगी ये बात सुनकर पास ही खड़ी एक बजुर्ग कहती है ,बेटा ख़ुशी मेरे लिए क्या लाओगी मेले से ??
काकी हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है मे आपके लिए नए कपडे लाऊंगी ख़ुशी कहती हुई घर दौड़ जाती है !
अगली सुबह ख़ुशी स्कूल जाकर अपनी मैडम को बताती है की मैडम इस बार हमारी फसल बहुत अच्छी हुई है ,अगले हफ्ते सब फसल बिक जाएगी और पिता जी आकर सारी फीस भर देंगें
प्रिंसिपल : चुप करो तुम, एक साल से तुम बहाने बाजी कर रही हो
ख़ुशी चुप चाप क्लास मे जाकर बैठ जाती है और मेला घूमने के सपने देखने लगती है तभी
ओले पड़ने लगते है
तेज बारिश आने लगती है बिजली कड़कने लगती है पेड़ ऐसे हिलते है मानो अभी गिर जाएंगे
ख़ुशी एकदम घबरा जाती है
ख़ुशी की आँखों मे आंसू आने लगते है वोही डर फिर सताने लगता है डर सब खत्म होने का , डर फसल बर्बाद होने का ,डर फीस ना दे पाने का ,स्कूल खत्म होने के बाद वो धीरे धीरे कांपती हुई घर की तरफ बढ़ने लगती है। हुआ भी ऐसा कि सभी फसल बर्बाद हो गई और खुशी स्कूल में फीस जमा नही करने के कारण ताना सुनने लगी।
उस छोटी सी बच्ची को मेला घुमने और बर्फी खाने का शौक मन में ही रह गया।
छोटे किसान और मजदूरों के परिवार में जो दर्द है उसे समझने में पूरी उम्र भी गुजर जाएगी तो भी शायद वास्तविक दर्द को महसूस नही कर सकते आप।।।
भारत के आम किसान का वास्तविक दर्द यह है।
Wednesday, 21 March 2018
Saturday, 19 August 2017
Sunday, 25 June 2017
आतंकवाद
आतंकवाद
कहते है आतंकवाद की कोई जात और धर्म नही होता तो
कश्मीर में आतंकवादी को शरण देने वाला देशद्रोही माना जाता है तो राजस्थान में आनंदपाल को शरण देने वाले क्या जय जय राजस्थान के भक्त सिपाही है ?
अब बारी है पारदर्शी और ईमानदार सरकार की ।
1 किसने छोड़ा ; छुड़ाया
2 किस किस के घर रहा
3 किसने शरण दी
4 कौन उसे सरकारी खबर देता
5 कितना धन है कैसे उसे जब्त किया जाए ?
Wednesday, 24 May 2017
एक सन्देश
एक आदमी ❄बर्फ बनाने वली कम्पनी में काम करता था___
एक दिन कारखाना बन्द होने से पहले अकेला फ्रिज करने वाले कमरे का चक्कर लगाने गया तो गलती से दरवाजा बंद हो गया
और वह अंदर बर्फ वाले हिस्से में फंस गया छुट्टी का वक़्त था और सब काम करने वाले लोग घर जा रहे थे
किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया की कोई अंदर फंस गया है।
वह समझ गया की दो-तीन घंटे बाद उसका शरीर बर्फ बन जाएगा अब जब मौत सामने नजर आने लगी तो
भगवान को सच्चे मन से याद करने लगा।
अपने कर्मों की क्षमा मांगने लगा और भगवान से कहा कि प्रह्लाद को तुमने अग्नि से बचाया, अहिल्या को पत्थर से नारि बनाया, शबरी के जुठे बेर खाकर उसे स्वर्ग में स्थान दिया।
प्रभु अगर मैंने जिंदगी में कोई एक काम भी मानवता व धर्म का किया है तो तूम मुझे यहाँ से बाहर निकालो।
मेरे बीवी बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उनका पेट पालने वाला इस दुनिया में सिर्फ मैं ही हूँ।
मैं पुरे जीवन आपके इस उपकार को याद रखूंगा और इतना कहते कहते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
एक घंटे ही गुजरे थे कि अचानक फ़्रीजर रूम में खट खट की आवाज हुई।
दरवाजा खुला चौकीदार भागता हुआ आया।
उस आदमी को उठाकर बाहर निकाला और 🔥 गर्म हीटर के पास ले गया।
उसकी हालत कुछ देर बाद ठीक हुई तो उसने चौकीदार से पूछा, आप अंदर कैसे आए?
चौकीदार बोला कि साहब मैं 20 साल से यहां काम कर रहा हूं। इस कारखाने में काम करते हुए हर रोज सैकड़ों मजदूर और ऑफिसर कारखाने में आते जाते हैं।
मैं देखता हूं लेकिन आप उन कुछ लोगों में से हो, जो जब भी कारखाने में आते हो तो मुझसे हंस कर *राम राम* करते हो
और हालचाल पूछते हो और निकलते हुए आपका *राम राम काका* कहना मेरी सारे दिन की थकावट दूर कर देता है।
जबकि अक्सर लोग मेरे पास से यूं गुजर जाते हैं कि जैसे मैं हूं ही नहीं।
आज हर दिनों की तरह मैंने आपका आते हुए अभिवादन तो सुना लेकिन *राम राम काका* सुनने के लिए इंतज़ार करता रहा।
जब ज्यादा देर हो गई तो मैं आपको तलाश करने चल पड़ा कि कहीं आप किसी मुश्किल में ना फंसे हो।
वह आदमी हैरान हो गया कि किसी को हंसकर *राम राम* कहने जैसे छोटे काम की वजह से आज उसकी जान बच गई।
*राम कहने से तर जाओगे*
_*आप सभी दोस्तों को दिलसे राम राम*_
Thursday, 1 September 2016
Wednesday, 24 August 2016
मूमल महेन्द्रा
"महेन्द्र और मूमल : प्रेम में भ्रम और परिहास की त्रासदी"
महेंद्र सिंध के अमरकोट का राजा था,
मूमल जैसलमेर की लुद्रवा की राजकुमारी.
महेंद्र राजा भी नहीं, राजकुमार ही था,
क्योंकि तबतक उसके पिता राणा वीसलदेव जीवित थे.
इधर मूमल राजकुमारी होकर भी रानी बन चुकी थी.
राजकुमारी कुमारी थी और राजकुमार की सात रानियाँ.
यह राजतंत्र के लिए अप्रत्याशित नहीं था.
एक दिन महेंद्र अपने बहनोई हमीर,
जो गुजरात के राजा या राजकुमार थे,
के साथ आखेट के लिए जैसलमेर तक पहुँच गए
और हिरण के साथ लुद्रवा तक.
कहानी के युग में लुद्रवा के पास एक मरुनदी भी थी,
नाम था- काक.
हिरण ने जल में छलाँग लगा दी.
उन्हें हिरण पर ही करुणा आ गई
या कि अब हृदय का हिरण बनना लिखा था,
उसे छोड़ दिया.
क्या जाने,
प्रकृति का प्रभाव था या लुद्रवा की संस्कृति का स्वभाव ही,
हमीर और महेंद्र मंत्रमुग्ध हो गए.
मरुभूमि में हरियाली थी,
हरियाली में सौंदर्य था,
सौंदर्य में प्रीति थी.
सब में शायद मूमल की छाया या छवि थी,
अव्यक्त या अज्ञात रूप में.
तभी दृश्य के परिदृश्य में
मूमल के महल का सौंदर्य दिखा,
दोनों उस ओर बढ़ चले.
शायद मूमल ने भी किसी प्राचीर या गवाक्ष से दोनों को देख लिया,
दोनों के वेश राजोचित थे.
सेवकों से परिचय पुछवाया,
सत्कार सहित बुलवाया.
महल बहुत भव्य व भिन्न था.
फर्श दर्पण सा दिखता,
छत आकाश सा.
कहीं शेर बैठा दिखता,
तो कहीं अजगर लिपटा हुआ.
हमीर को लगा कि सब माया जगत् है,
क्या जाने कोई जादूगरनी हो,
पीछे ठिठक गए.
महेंद्र बढ़ते गए,
साहस के साथ, विस्मय के साथ.
और जब मूमल से मिले,
तो जाना कि महल और माहौल का सौंदर्य तो कुछ भी नहीं.
लोग तो कहते हैं कि
वह आईना देखती, तो काँच टूट जाता,
संगमरमर पर पाँव रखती, वह जरा मोम हो जाता.
अभिभूत होना या तो विस्मित होना है,
या अनुगृहीत होना या फिर प्रीति में होना.
महेंद्र के साथ तीनों घटित हो गए.
सिंधु की बहती धारा के देश का राजकुमार
काक की विच्छिन्न लहरों की धरती पर मुग्ध हुआ है,
यह मूमल को सुखद लगा.
वह भी मुग्ध हो गई.
जब महेंद्र अमरकोट लौटा,
तो बस वही लौटा, उसका मन नहीं.
सात रानियाँ थीं, कोई बाँध न सकी.
राज में जो सबसे तेज चलने वाला और दूर तक जाने वाला ऊँट था,
उसका नाम था- चीतल.
उसकी तब प्रसिद्धि वही थी,
जो घोड़ों में चेतक की थी.
अमरकोट से जैसलमेर की दूरी सौ कोस थी,
आज का कोई तीन सौ किलो मीटर.
कहते हैं, महेंद्र रात भर में ही वहाँ पहुँच गया,
पहुँच ही नहीं गया, बल्कि मिलकर सुबह तक लौट भी आया.
अविश्वसनीयता की सीमा तक ले जाना ही तब कहानियों को लोकगाथा बनाता था।
कहानी तो कहती है कि यह फिर रोज की कहानी बन गया।
रानियों को भनक लगी,
तो चीतल ऊँट के पैर तुड़वा दिये.
महेंद्र ने दूसरी ऊँटनी ली, नाम था टोरडी.
पर वह कुछ यूँ चली या भागी कि
जैसलमेर की जगह बाड़मेर ले गई.
बहुत भूल भटक कर रास्ता पूछ-पूछ कर
जब महेन्द्र लुद्रवा पहुंचा
तब तक रात का तीसरा पहर बीत चुका था।
मूमल उसका इंतजार कर सो चुकी थी,
उसके कक्ष में दीया जल रहा था।
उस दिन मूमल की बहन सुमल भी मेड़ी में आई थी,
दोनों की बातें करते-करते आंख लग गयी थी।
सहेलियों के साथ दोनों बहनों ने देर रात तक खेल खेले थे,
सुमल ने खेल में पुरुषों के कपड़े पहन पुरुष का अभिनय किया था
और वह बातें करती-करती पुरुष के कपड़ों में ही मूमल के पलंग पर उसके साथ सो गयी।
महेन्द्र सीढियां चढ़ जैसे ही मूमल के कक्ष में घुसा और
देखा कि मूमल तो किसी पुरुष के साथ सो रही है।
यह दृश्य देखते ही महेन्द्र को तो लगा जैसे वज्रपात हो गया हो।
उसके हाथ में पकड़ा चाबुक वही गिर पड़ा
और वह जिन पैरों से आया था
उन्हीं से चुपचाप बिना किसी को कुछ कहे वापस अमरकोट लौट आया।
सात रानियों वाला पुरुष भी स्त्री से तो एकनिष्ठता ही चाहता है,
वह तो राजा था.
सुबह आंख खुलते ही मूमल की दृष्टि जैसे ही महेन्द्र के हाथ से छूटे चाबुक पर पड़ी,
वह समझ गयी कि महेन्द्र आया था,
पर शायद किसी बात से नाराज होकर चला गया।
संदेह हुआ कि संदेह का कारण कहीं सुमल का होना सोना तो नहीं.
अँधेरे बहुतों को अँधेरे में रखते और डालते रहे हैं।
कई दिनों तक मूमल महेन्द्र का इंतजार करती रही कि
वो आएगा
और
जब आएगा तो सारी गलतफहमियाँ दूर हो जाएंगी,
पर महेन्द्र नहीं आया।
मूमल उसके वियोग में फीकी पड़ गई,
उसने श्रृंगार छोड़ दिया, भोजन छोड़ दिया,
उसकी कंचन जैसी काया काली पड़ने लगी।
उसने महेन्द्र को कई पत्र लिखे,
पर महेन्द्र की रानियों ने उस तक पहुंचने ही नहीं दी।
शायद उस जमाने में राजा से अधिक प्रभावशाली रानियाँ होती थीं.
आखिर मूमल ने एक ढोली (गायक) को बुला महेन्द्र के पास भेजा,
पर उसे भी महेन्द्र से नहीं मिलने दिया गया।
वह किसी तरह महेन्द्र के महल के पास पहुंचने में सफल हो गया और
गीत-गीत में ही मूमल की दशा और उसका संदेशा बता दिया.
महेन्द्र ने गायक को कहा कि
मूमल से कह देना, मेरा अब उससे कोई संबंध नहीं।
गायक से सारी बात सुनकर मूमल ने तत्काल अमरकोट जाने के लिए रथ तैयार करवाया ताकि वह भ्रम दूर कर सके,
अपना प्रेम पा सके.
अमरकोट में मूमल के आने का संदेश व मिलने का आग्रह पाकर महेन्द्र ने सोचा,
मूमल का इतनी दूर तक चलकर आना, वह भी अकेले,
बस प्रेम में ही संभव है.
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गलत न हो,
मुझे ही कोई गलतफहमी हो गई हो.
उसने मूमल को संदेश भिजवाया कि
वह उससे सुबह मिलने आएगा।
मूमल को इस संदेश से आशा बँधी।
प्रेमातुर मन जितना विश्वासी होता है,
प्रेमाहत मन उतना ही संदेही.
रात को महेंद्र ने सोचा कि देखें,
मूमल मुझसे कितना प्यार करती है़.
परीक्षा लेने के लिए सुबह उसने अपने सेवक को
यह सिखा कर मूमल के पास भेजा कि कहना-
राणा महेंद्र को रात में काले नाग ने डस लिया,
जिससे उनकी मृत्यु हो गयी.
सेवक ने जैसे ही यह बात सुनाई,
मूमल मर्माहत हो धरती पर गिर पड़ी
और उसके प्राण पखेरु उड़ गये.
उधर महेंद्र ने जब मूमल की मृत्यु का समाचार सुना,
वह उसी वक्त पागल हो गया
कहते हैं,
थार के रेगिस्तान में वह बहुत दिनों तक भटकता रहा
और
भटकते हुए ही प्राण त्याग दिये.
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थार के रेगिस्तान में आज भी लोकगीतों में यह प्रेमकथा गायी जाती है- बहुत भाव लिए, बहुत राग लिए.
मूमल वहाँ के लिए सौंदर्य और सरलता की अधिष्ठात्री है,
महेंद्र चूक गया।
उसने प्रेम में संदेह रखा, परीक्षा रखी,
बिना स्वयं पर संदेह किये, बिना स्वयं परीक्षा दिए,
इसलिए वह आदर्श न बन सका.
मूमल का नगर लुद्रवा (प्राचीन रुद्रपुर) कभी जैसलमेर की प्राचीन राजधानी रहा है और अब बस ध्वंसावशेष है.
जैसलमेर नगर से 14 किमी दूर इस नगर में मूमल के महल के अवशेष "मूमल की मेड़ी" के नाम से मौजूद हैं.
अमरकोट अब पाकिस्तान में उमरकोट बन चुका है।
मरुप्रदेश में सुंदर बेटी या बहू को मूमल की उपमा दी जाती है. अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मरु महोत्सव में भी हर साल मिस मूमल सौंदर्य प्रतियोगिता होती है.
वहाँ के लोकगीतों में गाई जाती मांड विधा ने अनजाने में इस गाथा को विश्व तक पहुँचा दिया है।
ढोला-मारू और महेंद्र-मूमल की कहानियों में बहुत कुछ समान है,
मारू और मूमल दोनों मरुभूमि की राजकुमारियाँ हैं,
दोनों ही के नगर आज के प्रसिद्ध शहरों जैसलमेर और बीकानेर की प्राचीन राजधानी रहे हैं,
दोनों का प्रेम दूर देश के राजकुमारों से हुआ,
दोनों में ही प्रेम का प्रारंभ प्रेयसियाँ करती हैं,
दोनों के ही प्रेमी पूर्व विवाहित हैं और उनकी रानियाँ
उनकी प्रेयसियों के पत्र और संदेश उन तक पहुंचने नहीं देतीं.
दोनों का संदेश लोकगायक लेकर जाते हैं, सुनाते हैं,
दोनों की कहानियां मांड की लोकगायन विधा में दुहराई जाती हैं,
दोनों में प्रेमीयुगल में एक के सर्पदंश की कहानी है,
दोनों में प्रेमीयुगल में एक मरने की झूठी कहानी है,
दोनों में नायिकाएँ नायकों से बेहतर सिद्ध होती हैं,
शायद दोनों का घटनाकाल या रचनाकाल भी समान हो,
पर अंतिम नियति सर्वथा भिन्न है,
ढोला-मारू सुखांत परिणति पाते हैं,
मूमल-महेंद्र दु:खांत परिणति.
एक आइडिया
यह क्यों नहीं ?
आम उपभोक्ता बिजली मीटर किराये का मासिक किराया देता है जो कि यूनिट खर्च से भी ज्यादा तक आता है।
जब मीटर ऑटोमैटिक आया है , पैसे अडवांस जमा सिस्टम आया है तो यह क्यों नहीं कि......
24×30 में से बिजली कितने घण्टे रही उस हिसाब से आपका मीटर किराया अमुक बनता है ।
जागो ग्राहक जागो
यह राष्ट्रीय नहीं बनिया बिजली कंपनी है
Tuesday, 23 August 2016
रिश्ता भाईचारा
मैं रूठा, तुम भी रूठ गए
फिर मनाएगा कौन ?
आज दरार है, कल खाई होगी
फिर भरेगा कौन ?
मैं चुप, तुम भी चुप
इस चुप्पी को फिर तोडेगा कौन ?
बात छोटी को लगा लोगे दिल से,
तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ?
दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर,
सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?
न मैं राजी, न तुम राजी,
फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन ?
डूब जाएगा यादों में दिल कभी,
तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ?
एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी,
इस अहम् को फिर हराएगा कौन ?
ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए ?
फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन ?
मूंद ली दोनों में से गर किसी दिन एक ने आँखें....
तो कल इस बात पर फिर पछतायेगा कौन ?
आदर्श
ख्वाइशों से भरा पड़ा है घर इस कदर,
रिश्ते ज़रा सी जगह को तरसतें हैं !
मैं फकीरों से भी सौदा करता हूँ अक्सर,
जो एक रुपये में लाख दुआएं देता है !
क़ब्र की मिट्टी हाथ में लिए सोच रहा हूँ,
लोग मरते हैं तो ग़ुरूर कहाँ जाता है ?
बादशाह तो वक़्त होता है,
खामखा इंसान गुरुर करता है !!!!
Sunday, 21 August 2016
बचपन
कौन कहता है कि
बचपन लौट के नहीं आता
एक बार तबियत से मां के पास बैठो
बच्चा न महशूस करो तो #......
बेटियों की सफलता
🌿➖बोये जाते हैं बेटे..
🌿➖पर उग जाती हैं
बेटियाँ..
🌿➖खाद पानी बेटों को..
🌿➖पर लहराती हैं बेटियां.
🌿➖स्कूल जाते हैं बेटे..
🌿➖पर पढ़ जाती हैं
बेटियां..
🌿➖मेहनत करते हैं बेटे..
🌿➖पर अव्वल आती हैं
बेटियां..
🌿➖रुलाते हैं जब खूब बेटे.
🌿➖तब हंसाती हैं बेटियां.
🌿➖नाम करें न करें बेटे..
🌿➖पर नाम कमाती हैं
बेटियां..
🌿➖जब दर्द देते हैं बेटे...
🌿➖तब मरहम लगाती
हैं बेटियां..
🌿➖छोड़ जाते हैं जब बेटे..
🌿➖तो काम आती हैं
बेटियां..
🌿➖आशा रहती है बेटों से.
🌿➖पर पूर्ण करती हैं
बेटियां........
Saturday, 20 August 2016
एक आदर्श सत्य
ऐ जिंदगी तू इक लफड़ा है
कुछ ख्वाहिशो का ,
यहाँ ना तो किसी को गम चाहिये ,
और ना ही किसी को कम चाहिए ।।
Monday, 15 August 2016
A story of two brother
69yrs ago both India and Pakistan got independence
Indians have become CEOs of Google, Microsoft, Pepsico, Jaguar, Land Rover and
Pakistani have become heads of Taliban, Al-Qaeda, Jammat U Dawa, Hijbul Mujahideen
What a contrast......😊
Adding a line to this joke ...
India reached Mars and Pakistan still trying to enter India 😆
Friday, 10 June 2016
दुःख ने सुख से कहा तुम कितने भाग्यशाली हो ,जो लोग तुम्हें पाने की कोशिश में लगे रहते है सुख ने मुस्कराते हुए कहा भाग्यशाली मैं नहीं तुम हो !
दुःख ने हैरानी से पूछा : - "वो कैसे?
सुख ने बड़ी ईमानदारी से जबाब दिया वो ऐसे कि तुम्हें पाकर लोग अपनों को याद करते हैं ,लेकिन मुझे पाकर सब अपनों को भूल जाते हैं।
Tuesday, 7 June 2016
********
एक गाँव में जिलाधिकारी महोदय नसबंदी के महत्व और उपयोगिता के बारे में ग्राम सेवकों की एक सभा में भाषण कर रहे थे.
भाषण के बाद उन्होंने कहा कि अगर कोई सवाल पूछना चाहे तो पूछ सकता है.
एक ग्राम सेवक खडा हुआ और हाथ जोड़ कर बोला – साहब माफ़ किया जाये एक अटपटा सवाल पूछ रहा हूँ. पर यह मेरा सवाल नहीं है है, गाँव वाले पूछते है.
जिलाधिकारी महोदय ने उसे सवाल पूछने की अनुमति दे दी.
ग्राम सेवक ने कहा – सरकार गाँव वाले पूछते है की क्या जिलाधिकारी महोदय ने नसबंदी कराई है?
जिलाधिकारी महोदय ने कहा- नहीं मैंने नसबंदी नहीं कराई है.
ग्राम सेवक ने पूछा – सरकार गाँव वाले पूछते है की क्या कमिश्नर महोदय ने नसबंदी कराई है?
जिलाधिकारी महोदय ने कहा- जहाँ तक मुझे जानकारी है कमिश्नर महोदय ने भी नसबंदी नहीं कराई है.
ग्राम सेवक ने पूछ – सरकार गाँव वाले पूछते है कि क्या मंत्रालय के सचिव महोदय ने नसबंदी कराई है?
जिलाधिकारी महोदय ने कहा- मैं तुम्हारा सवाल समझ गया... देखो हम सब पढ़े – लिखे लोग हैं...हम बिना नसबंदी कराए ही परिवार नियोजन करते हैं.
ग्राम सेवक ने कहा- हुज़ूर यही तो गाँव वाले कहते हैं कि " हमें भी पढ़ाओ लिखाओ ,
हमारी नसबंदी करने के पीछे क्यों पड़े हो !!
🤓😎😎
Sunday, 29 May 2016
दर्द गोडा रो..
संग मोडा रो..
करणो होडा रो...
छानो कोनी रवै....
खायडो खिचड...
चिपेडो चिँचड...
आदत को लिचड...
छानो कोनी रवै...
घराँ बाजियोडा सोट...
छिटकायोडा होठ...
जाटणी रो रोट...
छानो कोनी रवै...
माँगियोडा बूँट...
खायोडी सूँठ..
.पावलो ऊँट...
छानो कोनी रवै...
फौजी की फीँत...
भोपी रो गीत...
झुठी प्रीत...
छानी कोनी रवै....
आँधी आती..
गाँव का बराती..
मतलब को साथी...
छानो कोनी रवै....
भाँग खायोडो...
दारू पीयोेडो..
अर माँ को बिगाडियोेडो...
छानो कोनी रवै....
Wednesday, 25 May 2016
कॉलेज में Happy married life पर
एक workshop हो रही थी,
जिसमे कुछ शादीशुदा
जोडे हिस्सा ले रहे थे।
जिस समय प्रोफेसर मंच पर आए
उन्होने नोट किया कि सभी
पति- पत्नी शादी पर
जोक कर हँस रहे थे...
ये देख कर प्रोफेसर ने कहा
कि चलो पहले एक Game खेलते है...
उसके बाद अपने विषय पर बातें करेंगे।
सभी खुश हो गए
और कहा कोनसा Game ?
प्रोफ़ेसर ने एक married
लड़की को खड़ा किया
और कहा कि तुम ब्लेक बोर्ड पे
ऐसे 25- 30 लोगों के नाम लिखो
जो तुम्हे सबसे अधिक प्यारे हों
लड़की ने पहले तो अपने परिवार के
लोगो के नाम लिखे
फिर अपने सगे सम्बन्धी,
दोस्तों,पडोसी और
सहकर्मियों के नाम लिख दिए...
अब प्रोफ़ेसर ने उसमे से
कोई भी कम पसंद वाले
5 नाम मिटाने को कहा...
लड़की ने अपने
सह कर्मियों के नाम मिटा दिए..
प्रोफ़ेसर ने और 5 नाम मिटाने को कहा...
लड़की ने थोडा सोच कर
अपने पड़ोसियो के नाम मिटा दिए...
अब प्रोफ़ेसर ने
और 10 नाम मिटाने को कहा...
लड़की ने अपने सगे सम्बन्धी
और दोस्तों के नाम मिटा दिए...
अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे
जो उसके मम्मी- पापा,
पति और बच्चे का नाम था..
अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से
और 2 नाम मिटा दो...
लड़की असमंजस में पड गयी
बहुत सोचने के बाद
बहुत दुखी होते हुए उसने
अपने मम्मी- पापा का
नाम मिटा दिया...
सभी लोग स्तब्ध और शांत थे
क्योकि वो जानते थे
कि ये गेम सिर्फ वो
लड़की ही नहीं खेल रही थी
उनके दिमाग में भी
यही सब चल रहा था।
अब सिर्फ 2 ही नाम बचे थे...
पति और बेटे का...
प्रोफ़ेसर ने कहा
और एक नाम मिटा दो...
लड़की अब सहमी सी रह गयी...
बहुत सोचने के बाद रोते हुए
अपने बेटे का नाम काट दिया...
प्रोफ़ेसर ने उस लड़की से कहा
तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ...
और सभी की तरफ गौर से देखा...
और पूछा-
क्या कोई बता सकता है
कि ऐसा क्यों हुआ कि सिर्फ
पति का ही नाम
बोर्ड पर रह गया।
कोई जवाब नहीं दे पाया...
सभी मुँह लटका कर बैठे थे...
प्रोफ़ेसर ने फिर
उस लड़की को खड़ा किया
और कहा...
ऐसा क्यों !
जिसने तुम्हे जन्म दिया
और पाल पोस कर
इतना बड़ा किया
उनका नाम तुमने मिटा दिया...
और तो और तुमने अपनी
कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया
उसका भी नाम तुमने मिटा दिया ?
लड़की ने जवाब दिया.......
कि अब मम्मी- पापा बूढ़े हो चुके हैं,
कुछ साल के बाद वो मुझे
और इस दुनिया को छोड़ के
चले जायेंगे ......
मेरा बेटा जब बड़ा हो जायेगा
तो जरूरी नहीं कि वो
शादी के बाद मेरे साथ ही रहे।
लेकिन मेरे पति जब तक मेरी
जान में जान है
तब तक मेरा आधा शरीर बनके
मेरा साथ निभायेंगे
इस लिए मेरे लिए
सबसे अजीज मेरे पति हैं..
प्रोफ़ेसर और बाकी स्टूडेंट ने
तालियों की गूंज से
लड़की को सलामी दी...
प्रोफ़ेसर ने कहा
तुमने बिलकुल सही कहा
कि तुम और सभी के बिना
रह सकती हो
पर अपने आधे अंग अर्थात
अपने पति के बिना नहीं रह सकती l
मजाक मस्ती तक तो ठीक है
पर हर इंसान का
अपना जीवन साथी ही
उसको सब से ज्यादा
अजीज होता है...
ये सचमुच सच है for all husband and wife कभी मत भूलना.....
Thursday, 12 May 2016
पाण्यू चाली रे तालाब, बाला जो
काळी रे कळायण उमडी ए*पणिहारी जीयेलो, मिरगानेणी*जीयेलो,
छोटोडी बूंदां रो बरसे मेह, बालाजो।
आज धराऊं धूंधलो ए पणिहारी..........
मोटोडो धारां रो बरसे मेह, बाला जो।
भर नाडा भर नाडयां ए पणिहारी..........
भरियो-भरियो समंद तलाब, बाला जो।
Sunday, 3 April 2016
म्हारो राजस्थान
आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठा मोरां री
ईं धरती रो रूतबो ऊंचो, आ बात कवै कूंचो कूंचो,
आं फोगां में निपज्या हीरा, आं बांठां में नाची मीरा,
पन्ना री जामण आ सागण, आ ही प्रताप री मा भागण,
दादू रैदास कथी वाणी, पीथळ रै पाण रयो पाणी,
जौहर री जागी आग अठै, रळ मिलग्या राग विराग अठै,
तलवार उगी रण खेतां में, इतिहास मंड़योड़ा रेतां में,
बो सत रो सीरी आडावळ, बा पत री साख भरै चंबळ,
चूंडावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दिया क्षत्राणी,
ईं कूख जलमियो भामासा, राणा री पूरी मन आसा,
बो जोधो दुरगादास जबर, भिड़ लीन्ही दिल्ली स्यूं टक्कर,
जुग जुग में आगीवाण हुया, घर गळी गांव घमसान हुया,
पग पग पर जागी जोत अठै, मरणै स्यूं मधरी मौत अठै,
रूं रूं में छतरयां देवळ है, आ अमर जुझारां री थळ है,
हर एक खेजड़ै खेड़ा में, रोहीड़ा खींप कंकेड़ा में
मारू री गूंजी राग अठै, बलिदान हुया बेथाग अठै,
आ मायड़ संतां शूरां री, आ भोम बांकुरा वीरां री,
आ माटी मोठ मतीरां री, आ धूणी ध्यानी धीरां री,
आ साथण काचर बोरां री, आ मरवण लूआं लोरां री
आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठै मोरां री।
Saturday, 2 April 2016
आधुनिक सच
मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं
तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं
सुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं
रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं
अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं
अकेले रह कर वह कैरियर बनाते हैं
कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं
भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं
मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं
अपने नन्हे मुन्ने को पाल नहीं पाते हैं
फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते हैं
उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते हैं
परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है
केवल आया'आंटी को ही पहचानता है
दादा -दादी, नाना-नानी कौन होते है?
अनजान है सबसे किसी को न मानता है
आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है
टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है
यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती है
छुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है
नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है
जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है
उसे सुलाने में अक्सर वो भी सो जाती है
कभी जब मचलता है तो टीवी दिखाती है
जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है
देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता है
वीक ऐन्ड पर मौल में पिकनिक मनाता है
संडे की छुट्टी मौम-डैड के संग बिताता है
वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है
वह स्कूल से निकल के कालेज में आता है
कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है
आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है
वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है
मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है
धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है
मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है
कुछ दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है
जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है
माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है
बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है
बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं
जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं
क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं
घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं
हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं
दाढ़- दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं
कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं
वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं
सोचना की बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो या विदेश की सेवा के लिए।
बेटा एडिलेड में, बेटी है न्यूयार्क।
ब्राईट बच्चों के लिए, हुआ बुढ़ापा डार्क।
बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार।
चिता जलाने बाप की, गए पड़ोसी चार।
ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार।
दुनियां छोटी हो गई, रिश्ते हैं बीमार।
बूढ़ा-बूढ़ी आँख में, भरते खारा नीर।
हरिद्वार के घाट की, सिडनी में तकदीर।

