Saturday, 19 August 2017
Sunday, 25 June 2017
आतंकवाद
आतंकवाद
कहते है आतंकवाद की कोई जात और धर्म नही होता तो
कश्मीर में आतंकवादी को शरण देने वाला देशद्रोही माना जाता है तो राजस्थान में आनंदपाल को शरण देने वाले क्या जय जय राजस्थान के भक्त सिपाही है ?
अब बारी है पारदर्शी और ईमानदार सरकार की ।
1 किसने छोड़ा ; छुड़ाया
2 किस किस के घर रहा
3 किसने शरण दी
4 कौन उसे सरकारी खबर देता
5 कितना धन है कैसे उसे जब्त किया जाए ?
Wednesday, 24 May 2017
एक सन्देश
एक आदमी ❄बर्फ बनाने वली कम्पनी में काम करता था___
एक दिन कारखाना बन्द होने से पहले अकेला फ्रिज करने वाले कमरे का चक्कर लगाने गया तो गलती से दरवाजा बंद हो गया
और वह अंदर बर्फ वाले हिस्से में फंस गया छुट्टी का वक़्त था और सब काम करने वाले लोग घर जा रहे थे
किसी ने भी अधिक ध्यान नहीं दिया की कोई अंदर फंस गया है।
वह समझ गया की दो-तीन घंटे बाद उसका शरीर बर्फ बन जाएगा अब जब मौत सामने नजर आने लगी तो
भगवान को सच्चे मन से याद करने लगा।
अपने कर्मों की क्षमा मांगने लगा और भगवान से कहा कि प्रह्लाद को तुमने अग्नि से बचाया, अहिल्या को पत्थर से नारि बनाया, शबरी के जुठे बेर खाकर उसे स्वर्ग में स्थान दिया।
प्रभु अगर मैंने जिंदगी में कोई एक काम भी मानवता व धर्म का किया है तो तूम मुझे यहाँ से बाहर निकालो।
मेरे बीवी बच्चे मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे। उनका पेट पालने वाला इस दुनिया में सिर्फ मैं ही हूँ।
मैं पुरे जीवन आपके इस उपकार को याद रखूंगा और इतना कहते कहते उसकी आंखों से आंसू निकलने लगे।
एक घंटे ही गुजरे थे कि अचानक फ़्रीजर रूम में खट खट की आवाज हुई।
दरवाजा खुला चौकीदार भागता हुआ आया।
उस आदमी को उठाकर बाहर निकाला और 🔥 गर्म हीटर के पास ले गया।
उसकी हालत कुछ देर बाद ठीक हुई तो उसने चौकीदार से पूछा, आप अंदर कैसे आए?
चौकीदार बोला कि साहब मैं 20 साल से यहां काम कर रहा हूं। इस कारखाने में काम करते हुए हर रोज सैकड़ों मजदूर और ऑफिसर कारखाने में आते जाते हैं।
मैं देखता हूं लेकिन आप उन कुछ लोगों में से हो, जो जब भी कारखाने में आते हो तो मुझसे हंस कर *राम राम* करते हो
और हालचाल पूछते हो और निकलते हुए आपका *राम राम काका* कहना मेरी सारे दिन की थकावट दूर कर देता है।
जबकि अक्सर लोग मेरे पास से यूं गुजर जाते हैं कि जैसे मैं हूं ही नहीं।
आज हर दिनों की तरह मैंने आपका आते हुए अभिवादन तो सुना लेकिन *राम राम काका* सुनने के लिए इंतज़ार करता रहा।
जब ज्यादा देर हो गई तो मैं आपको तलाश करने चल पड़ा कि कहीं आप किसी मुश्किल में ना फंसे हो।
वह आदमी हैरान हो गया कि किसी को हंसकर *राम राम* कहने जैसे छोटे काम की वजह से आज उसकी जान बच गई।
*राम कहने से तर जाओगे*
_*आप सभी दोस्तों को दिलसे राम राम*_
Thursday, 1 September 2016
Wednesday, 24 August 2016
मूमल महेन्द्रा
"महेन्द्र और मूमल : प्रेम में भ्रम और परिहास की त्रासदी"
महेंद्र सिंध के अमरकोट का राजा था,
मूमल जैसलमेर की लुद्रवा की राजकुमारी.
महेंद्र राजा भी नहीं, राजकुमार ही था,
क्योंकि तबतक उसके पिता राणा वीसलदेव जीवित थे.
इधर मूमल राजकुमारी होकर भी रानी बन चुकी थी.
राजकुमारी कुमारी थी और राजकुमार की सात रानियाँ.
यह राजतंत्र के लिए अप्रत्याशित नहीं था.
एक दिन महेंद्र अपने बहनोई हमीर,
जो गुजरात के राजा या राजकुमार थे,
के साथ आखेट के लिए जैसलमेर तक पहुँच गए
और हिरण के साथ लुद्रवा तक.
कहानी के युग में लुद्रवा के पास एक मरुनदी भी थी,
नाम था- काक.
हिरण ने जल में छलाँग लगा दी.
उन्हें हिरण पर ही करुणा आ गई
या कि अब हृदय का हिरण बनना लिखा था,
उसे छोड़ दिया.
क्या जाने,
प्रकृति का प्रभाव था या लुद्रवा की संस्कृति का स्वभाव ही,
हमीर और महेंद्र मंत्रमुग्ध हो गए.
मरुभूमि में हरियाली थी,
हरियाली में सौंदर्य था,
सौंदर्य में प्रीति थी.
सब में शायद मूमल की छाया या छवि थी,
अव्यक्त या अज्ञात रूप में.
तभी दृश्य के परिदृश्य में
मूमल के महल का सौंदर्य दिखा,
दोनों उस ओर बढ़ चले.
शायद मूमल ने भी किसी प्राचीर या गवाक्ष से दोनों को देख लिया,
दोनों के वेश राजोचित थे.
सेवकों से परिचय पुछवाया,
सत्कार सहित बुलवाया.
महल बहुत भव्य व भिन्न था.
फर्श दर्पण सा दिखता,
छत आकाश सा.
कहीं शेर बैठा दिखता,
तो कहीं अजगर लिपटा हुआ.
हमीर को लगा कि सब माया जगत् है,
क्या जाने कोई जादूगरनी हो,
पीछे ठिठक गए.
महेंद्र बढ़ते गए,
साहस के साथ, विस्मय के साथ.
और जब मूमल से मिले,
तो जाना कि महल और माहौल का सौंदर्य तो कुछ भी नहीं.
लोग तो कहते हैं कि
वह आईना देखती, तो काँच टूट जाता,
संगमरमर पर पाँव रखती, वह जरा मोम हो जाता.
अभिभूत होना या तो विस्मित होना है,
या अनुगृहीत होना या फिर प्रीति में होना.
महेंद्र के साथ तीनों घटित हो गए.
सिंधु की बहती धारा के देश का राजकुमार
काक की विच्छिन्न लहरों की धरती पर मुग्ध हुआ है,
यह मूमल को सुखद लगा.
वह भी मुग्ध हो गई.
जब महेंद्र अमरकोट लौटा,
तो बस वही लौटा, उसका मन नहीं.
सात रानियाँ थीं, कोई बाँध न सकी.
राज में जो सबसे तेज चलने वाला और दूर तक जाने वाला ऊँट था,
उसका नाम था- चीतल.
उसकी तब प्रसिद्धि वही थी,
जो घोड़ों में चेतक की थी.
अमरकोट से जैसलमेर की दूरी सौ कोस थी,
आज का कोई तीन सौ किलो मीटर.
कहते हैं, महेंद्र रात भर में ही वहाँ पहुँच गया,
पहुँच ही नहीं गया, बल्कि मिलकर सुबह तक लौट भी आया.
अविश्वसनीयता की सीमा तक ले जाना ही तब कहानियों को लोकगाथा बनाता था।
कहानी तो कहती है कि यह फिर रोज की कहानी बन गया।
रानियों को भनक लगी,
तो चीतल ऊँट के पैर तुड़वा दिये.
महेंद्र ने दूसरी ऊँटनी ली, नाम था टोरडी.
पर वह कुछ यूँ चली या भागी कि
जैसलमेर की जगह बाड़मेर ले गई.
बहुत भूल भटक कर रास्ता पूछ-पूछ कर
जब महेन्द्र लुद्रवा पहुंचा
तब तक रात का तीसरा पहर बीत चुका था।
मूमल उसका इंतजार कर सो चुकी थी,
उसके कक्ष में दीया जल रहा था।
उस दिन मूमल की बहन सुमल भी मेड़ी में आई थी,
दोनों की बातें करते-करते आंख लग गयी थी।
सहेलियों के साथ दोनों बहनों ने देर रात तक खेल खेले थे,
सुमल ने खेल में पुरुषों के कपड़े पहन पुरुष का अभिनय किया था
और वह बातें करती-करती पुरुष के कपड़ों में ही मूमल के पलंग पर उसके साथ सो गयी।
महेन्द्र सीढियां चढ़ जैसे ही मूमल के कक्ष में घुसा और
देखा कि मूमल तो किसी पुरुष के साथ सो रही है।
यह दृश्य देखते ही महेन्द्र को तो लगा जैसे वज्रपात हो गया हो।
उसके हाथ में पकड़ा चाबुक वही गिर पड़ा
और वह जिन पैरों से आया था
उन्हीं से चुपचाप बिना किसी को कुछ कहे वापस अमरकोट लौट आया।
सात रानियों वाला पुरुष भी स्त्री से तो एकनिष्ठता ही चाहता है,
वह तो राजा था.
सुबह आंख खुलते ही मूमल की दृष्टि जैसे ही महेन्द्र के हाथ से छूटे चाबुक पर पड़ी,
वह समझ गयी कि महेन्द्र आया था,
पर शायद किसी बात से नाराज होकर चला गया।
संदेह हुआ कि संदेह का कारण कहीं सुमल का होना सोना तो नहीं.
अँधेरे बहुतों को अँधेरे में रखते और डालते रहे हैं।
कई दिनों तक मूमल महेन्द्र का इंतजार करती रही कि
वो आएगा
और
जब आएगा तो सारी गलतफहमियाँ दूर हो जाएंगी,
पर महेन्द्र नहीं आया।
मूमल उसके वियोग में फीकी पड़ गई,
उसने श्रृंगार छोड़ दिया, भोजन छोड़ दिया,
उसकी कंचन जैसी काया काली पड़ने लगी।
उसने महेन्द्र को कई पत्र लिखे,
पर महेन्द्र की रानियों ने उस तक पहुंचने ही नहीं दी।
शायद उस जमाने में राजा से अधिक प्रभावशाली रानियाँ होती थीं.
आखिर मूमल ने एक ढोली (गायक) को बुला महेन्द्र के पास भेजा,
पर उसे भी महेन्द्र से नहीं मिलने दिया गया।
वह किसी तरह महेन्द्र के महल के पास पहुंचने में सफल हो गया और
गीत-गीत में ही मूमल की दशा और उसका संदेशा बता दिया.
महेन्द्र ने गायक को कहा कि
मूमल से कह देना, मेरा अब उससे कोई संबंध नहीं।
गायक से सारी बात सुनकर मूमल ने तत्काल अमरकोट जाने के लिए रथ तैयार करवाया ताकि वह भ्रम दूर कर सके,
अपना प्रेम पा सके.
अमरकोट में मूमल के आने का संदेश व मिलने का आग्रह पाकर महेन्द्र ने सोचा,
मूमल का इतनी दूर तक चलकर आना, वह भी अकेले,
बस प्रेम में ही संभव है.
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गलत न हो,
मुझे ही कोई गलतफहमी हो गई हो.
उसने मूमल को संदेश भिजवाया कि
वह उससे सुबह मिलने आएगा।
मूमल को इस संदेश से आशा बँधी।
प्रेमातुर मन जितना विश्वासी होता है,
प्रेमाहत मन उतना ही संदेही.
रात को महेंद्र ने सोचा कि देखें,
मूमल मुझसे कितना प्यार करती है़.
परीक्षा लेने के लिए सुबह उसने अपने सेवक को
यह सिखा कर मूमल के पास भेजा कि कहना-
राणा महेंद्र को रात में काले नाग ने डस लिया,
जिससे उनकी मृत्यु हो गयी.
सेवक ने जैसे ही यह बात सुनाई,
मूमल मर्माहत हो धरती पर गिर पड़ी
और उसके प्राण पखेरु उड़ गये.
उधर महेंद्र ने जब मूमल की मृत्यु का समाचार सुना,
वह उसी वक्त पागल हो गया
कहते हैं,
थार के रेगिस्तान में वह बहुत दिनों तक भटकता रहा
और
भटकते हुए ही प्राण त्याग दिये.
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थार के रेगिस्तान में आज भी लोकगीतों में यह प्रेमकथा गायी जाती है- बहुत भाव लिए, बहुत राग लिए.
मूमल वहाँ के लिए सौंदर्य और सरलता की अधिष्ठात्री है,
महेंद्र चूक गया।
उसने प्रेम में संदेह रखा, परीक्षा रखी,
बिना स्वयं पर संदेह किये, बिना स्वयं परीक्षा दिए,
इसलिए वह आदर्श न बन सका.
मूमल का नगर लुद्रवा (प्राचीन रुद्रपुर) कभी जैसलमेर की प्राचीन राजधानी रहा है और अब बस ध्वंसावशेष है.
जैसलमेर नगर से 14 किमी दूर इस नगर में मूमल के महल के अवशेष "मूमल की मेड़ी" के नाम से मौजूद हैं.
अमरकोट अब पाकिस्तान में उमरकोट बन चुका है।
मरुप्रदेश में सुंदर बेटी या बहू को मूमल की उपमा दी जाती है. अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मरु महोत्सव में भी हर साल मिस मूमल सौंदर्य प्रतियोगिता होती है.
वहाँ के लोकगीतों में गाई जाती मांड विधा ने अनजाने में इस गाथा को विश्व तक पहुँचा दिया है।
ढोला-मारू और महेंद्र-मूमल की कहानियों में बहुत कुछ समान है,
मारू और मूमल दोनों मरुभूमि की राजकुमारियाँ हैं,
दोनों ही के नगर आज के प्रसिद्ध शहरों जैसलमेर और बीकानेर की प्राचीन राजधानी रहे हैं,
दोनों का प्रेम दूर देश के राजकुमारों से हुआ,
दोनों में ही प्रेम का प्रारंभ प्रेयसियाँ करती हैं,
दोनों के ही प्रेमी पूर्व विवाहित हैं और उनकी रानियाँ
उनकी प्रेयसियों के पत्र और संदेश उन तक पहुंचने नहीं देतीं.
दोनों का संदेश लोकगायक लेकर जाते हैं, सुनाते हैं,
दोनों की कहानियां मांड की लोकगायन विधा में दुहराई जाती हैं,
दोनों में प्रेमीयुगल में एक के सर्पदंश की कहानी है,
दोनों में प्रेमीयुगल में एक मरने की झूठी कहानी है,
दोनों में नायिकाएँ नायकों से बेहतर सिद्ध होती हैं,
शायद दोनों का घटनाकाल या रचनाकाल भी समान हो,
पर अंतिम नियति सर्वथा भिन्न है,
ढोला-मारू सुखांत परिणति पाते हैं,
मूमल-महेंद्र दु:खांत परिणति.
एक आइडिया
यह क्यों नहीं ?
आम उपभोक्ता बिजली मीटर किराये का मासिक किराया देता है जो कि यूनिट खर्च से भी ज्यादा तक आता है।
जब मीटर ऑटोमैटिक आया है , पैसे अडवांस जमा सिस्टम आया है तो यह क्यों नहीं कि......
24×30 में से बिजली कितने घण्टे रही उस हिसाब से आपका मीटर किराया अमुक बनता है ।
जागो ग्राहक जागो
यह राष्ट्रीय नहीं बनिया बिजली कंपनी है
Tuesday, 23 August 2016
रिश्ता भाईचारा
मैं रूठा, तुम भी रूठ गए
फिर मनाएगा कौन ?
आज दरार है, कल खाई होगी
फिर भरेगा कौन ?
मैं चुप, तुम भी चुप
इस चुप्पी को फिर तोडेगा कौन ?
बात छोटी को लगा लोगे दिल से,
तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ?
दुखी मैं भी और तुम भी बिछड़कर,
सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ?
न मैं राजी, न तुम राजी,
फिर माफ़ करने का बड़प्पन दिखाएगा कौन ?
डूब जाएगा यादों में दिल कभी,
तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ?
एक अहम् मेरे, एक तेरे भीतर भी,
इस अहम् को फिर हराएगा कौन ?
ज़िंदगी किसको मिली है सदा के लिए ?
फिर इन लम्हों में अकेला रह जाएगा कौन ?
मूंद ली दोनों में से गर किसी दिन एक ने आँखें....
तो कल इस बात पर फिर पछतायेगा कौन ?
आदर्श
ख्वाइशों से भरा पड़ा है घर इस कदर,
रिश्ते ज़रा सी जगह को तरसतें हैं !
मैं फकीरों से भी सौदा करता हूँ अक्सर,
जो एक रुपये में लाख दुआएं देता है !
क़ब्र की मिट्टी हाथ में लिए सोच रहा हूँ,
लोग मरते हैं तो ग़ुरूर कहाँ जाता है ?
बादशाह तो वक़्त होता है,
खामखा इंसान गुरुर करता है !!!!
Sunday, 21 August 2016
बचपन
कौन कहता है कि
बचपन लौट के नहीं आता
एक बार तबियत से मां के पास बैठो
बच्चा न महशूस करो तो #......
बेटियों की सफलता
🌿➖बोये जाते हैं बेटे..
🌿➖पर उग जाती हैं
बेटियाँ..
🌿➖खाद पानी बेटों को..
🌿➖पर लहराती हैं बेटियां.
🌿➖स्कूल जाते हैं बेटे..
🌿➖पर पढ़ जाती हैं
बेटियां..
🌿➖मेहनत करते हैं बेटे..
🌿➖पर अव्वल आती हैं
बेटियां..
🌿➖रुलाते हैं जब खूब बेटे.
🌿➖तब हंसाती हैं बेटियां.
🌿➖नाम करें न करें बेटे..
🌿➖पर नाम कमाती हैं
बेटियां..
🌿➖जब दर्द देते हैं बेटे...
🌿➖तब मरहम लगाती
हैं बेटियां..
🌿➖छोड़ जाते हैं जब बेटे..
🌿➖तो काम आती हैं
बेटियां..
🌿➖आशा रहती है बेटों से.
🌿➖पर पूर्ण करती हैं
बेटियां........
Saturday, 20 August 2016
एक आदर्श सत्य
ऐ जिंदगी तू इक लफड़ा है
कुछ ख्वाहिशो का ,
यहाँ ना तो किसी को गम चाहिये ,
और ना ही किसी को कम चाहिए ।।
Monday, 15 August 2016
A story of two brother
69yrs ago both India and Pakistan got independence
Indians have become CEOs of Google, Microsoft, Pepsico, Jaguar, Land Rover and
Pakistani have become heads of Taliban, Al-Qaeda, Jammat U Dawa, Hijbul Mujahideen
What a contrast......😊
Adding a line to this joke ...
India reached Mars and Pakistan still trying to enter India 😆
Friday, 10 June 2016
दुःख ने सुख से कहा तुम कितने भाग्यशाली हो ,जो लोग तुम्हें पाने की कोशिश में लगे रहते है सुख ने मुस्कराते हुए कहा भाग्यशाली मैं नहीं तुम हो !
दुःख ने हैरानी से पूछा : - "वो कैसे?
सुख ने बड़ी ईमानदारी से जबाब दिया वो ऐसे कि तुम्हें पाकर लोग अपनों को याद करते हैं ,लेकिन मुझे पाकर सब अपनों को भूल जाते हैं।
Tuesday, 7 June 2016
********
एक गाँव में जिलाधिकारी महोदय नसबंदी के महत्व और उपयोगिता के बारे में ग्राम सेवकों की एक सभा में भाषण कर रहे थे.
भाषण के बाद उन्होंने कहा कि अगर कोई सवाल पूछना चाहे तो पूछ सकता है.
एक ग्राम सेवक खडा हुआ और हाथ जोड़ कर बोला – साहब माफ़ किया जाये एक अटपटा सवाल पूछ रहा हूँ. पर यह मेरा सवाल नहीं है है, गाँव वाले पूछते है.
जिलाधिकारी महोदय ने उसे सवाल पूछने की अनुमति दे दी.
ग्राम सेवक ने कहा – सरकार गाँव वाले पूछते है की क्या जिलाधिकारी महोदय ने नसबंदी कराई है?
जिलाधिकारी महोदय ने कहा- नहीं मैंने नसबंदी नहीं कराई है.
ग्राम सेवक ने पूछा – सरकार गाँव वाले पूछते है की क्या कमिश्नर महोदय ने नसबंदी कराई है?
जिलाधिकारी महोदय ने कहा- जहाँ तक मुझे जानकारी है कमिश्नर महोदय ने भी नसबंदी नहीं कराई है.
ग्राम सेवक ने पूछ – सरकार गाँव वाले पूछते है कि क्या मंत्रालय के सचिव महोदय ने नसबंदी कराई है?
जिलाधिकारी महोदय ने कहा- मैं तुम्हारा सवाल समझ गया... देखो हम सब पढ़े – लिखे लोग हैं...हम बिना नसबंदी कराए ही परिवार नियोजन करते हैं.
ग्राम सेवक ने कहा- हुज़ूर यही तो गाँव वाले कहते हैं कि " हमें भी पढ़ाओ लिखाओ ,
हमारी नसबंदी करने के पीछे क्यों पड़े हो !!
🤓😎😎
Sunday, 29 May 2016
दर्द गोडा रो..
संग मोडा रो..
करणो होडा रो...
छानो कोनी रवै....
खायडो खिचड...
चिपेडो चिँचड...
आदत को लिचड...
छानो कोनी रवै...
घराँ बाजियोडा सोट...
छिटकायोडा होठ...
जाटणी रो रोट...
छानो कोनी रवै...
माँगियोडा बूँट...
खायोडी सूँठ..
.पावलो ऊँट...
छानो कोनी रवै...
फौजी की फीँत...
भोपी रो गीत...
झुठी प्रीत...
छानी कोनी रवै....
आँधी आती..
गाँव का बराती..
मतलब को साथी...
छानो कोनी रवै....
भाँग खायोडो...
दारू पीयोेडो..
अर माँ को बिगाडियोेडो...
छानो कोनी रवै....
Wednesday, 25 May 2016
कॉलेज में Happy married life पर
एक workshop हो रही थी,
जिसमे कुछ शादीशुदा
जोडे हिस्सा ले रहे थे।
जिस समय प्रोफेसर मंच पर आए
उन्होने नोट किया कि सभी
पति- पत्नी शादी पर
जोक कर हँस रहे थे...
ये देख कर प्रोफेसर ने कहा
कि चलो पहले एक Game खेलते है...
उसके बाद अपने विषय पर बातें करेंगे।
सभी खुश हो गए
और कहा कोनसा Game ?
प्रोफ़ेसर ने एक married
लड़की को खड़ा किया
और कहा कि तुम ब्लेक बोर्ड पे
ऐसे 25- 30 लोगों के नाम लिखो
जो तुम्हे सबसे अधिक प्यारे हों
लड़की ने पहले तो अपने परिवार के
लोगो के नाम लिखे
फिर अपने सगे सम्बन्धी,
दोस्तों,पडोसी और
सहकर्मियों के नाम लिख दिए...
अब प्रोफ़ेसर ने उसमे से
कोई भी कम पसंद वाले
5 नाम मिटाने को कहा...
लड़की ने अपने
सह कर्मियों के नाम मिटा दिए..
प्रोफ़ेसर ने और 5 नाम मिटाने को कहा...
लड़की ने थोडा सोच कर
अपने पड़ोसियो के नाम मिटा दिए...
अब प्रोफ़ेसर ने
और 10 नाम मिटाने को कहा...
लड़की ने अपने सगे सम्बन्धी
और दोस्तों के नाम मिटा दिए...
अब बोर्ड पर सिर्फ 4 नाम बचे थे
जो उसके मम्मी- पापा,
पति और बच्चे का नाम था..
अब प्रोफ़ेसर ने कहा इसमें से
और 2 नाम मिटा दो...
लड़की असमंजस में पड गयी
बहुत सोचने के बाद
बहुत दुखी होते हुए उसने
अपने मम्मी- पापा का
नाम मिटा दिया...
सभी लोग स्तब्ध और शांत थे
क्योकि वो जानते थे
कि ये गेम सिर्फ वो
लड़की ही नहीं खेल रही थी
उनके दिमाग में भी
यही सब चल रहा था।
अब सिर्फ 2 ही नाम बचे थे...
पति और बेटे का...
प्रोफ़ेसर ने कहा
और एक नाम मिटा दो...
लड़की अब सहमी सी रह गयी...
बहुत सोचने के बाद रोते हुए
अपने बेटे का नाम काट दिया...
प्रोफ़ेसर ने उस लड़की से कहा
तुम अपनी जगह पर जाकर बैठ जाओ...
और सभी की तरफ गौर से देखा...
और पूछा-
क्या कोई बता सकता है
कि ऐसा क्यों हुआ कि सिर्फ
पति का ही नाम
बोर्ड पर रह गया।
कोई जवाब नहीं दे पाया...
सभी मुँह लटका कर बैठे थे...
प्रोफ़ेसर ने फिर
उस लड़की को खड़ा किया
और कहा...
ऐसा क्यों !
जिसने तुम्हे जन्म दिया
और पाल पोस कर
इतना बड़ा किया
उनका नाम तुमने मिटा दिया...
और तो और तुमने अपनी
कोख से जिस बच्चे को जन्म दिया
उसका भी नाम तुमने मिटा दिया ?
लड़की ने जवाब दिया.......
कि अब मम्मी- पापा बूढ़े हो चुके हैं,
कुछ साल के बाद वो मुझे
और इस दुनिया को छोड़ के
चले जायेंगे ......
मेरा बेटा जब बड़ा हो जायेगा
तो जरूरी नहीं कि वो
शादी के बाद मेरे साथ ही रहे।
लेकिन मेरे पति जब तक मेरी
जान में जान है
तब तक मेरा आधा शरीर बनके
मेरा साथ निभायेंगे
इस लिए मेरे लिए
सबसे अजीज मेरे पति हैं..
प्रोफ़ेसर और बाकी स्टूडेंट ने
तालियों की गूंज से
लड़की को सलामी दी...
प्रोफ़ेसर ने कहा
तुमने बिलकुल सही कहा
कि तुम और सभी के बिना
रह सकती हो
पर अपने आधे अंग अर्थात
अपने पति के बिना नहीं रह सकती l
मजाक मस्ती तक तो ठीक है
पर हर इंसान का
अपना जीवन साथी ही
उसको सब से ज्यादा
अजीज होता है...
ये सचमुच सच है for all husband and wife कभी मत भूलना.....
Thursday, 12 May 2016
पाण्यू चाली रे तालाब, बाला जो
काळी रे कळायण उमडी ए*पणिहारी जीयेलो, मिरगानेणी*जीयेलो,
छोटोडी बूंदां रो बरसे मेह, बालाजो।
आज धराऊं धूंधलो ए पणिहारी..........
मोटोडो धारां रो बरसे मेह, बाला जो।
भर नाडा भर नाडयां ए पणिहारी..........
भरियो-भरियो समंद तलाब, बाला जो।
Sunday, 3 April 2016
म्हारो राजस्थान
आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठा मोरां री
ईं धरती रो रूतबो ऊंचो, आ बात कवै कूंचो कूंचो,
आं फोगां में निपज्या हीरा, आं बांठां में नाची मीरा,
पन्ना री जामण आ सागण, आ ही प्रताप री मा भागण,
दादू रैदास कथी वाणी, पीथळ रै पाण रयो पाणी,
जौहर री जागी आग अठै, रळ मिलग्या राग विराग अठै,
तलवार उगी रण खेतां में, इतिहास मंड़योड़ा रेतां में,
बो सत रो सीरी आडावळ, बा पत री साख भरै चंबळ,
चूंडावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दिया क्षत्राणी,
ईं कूख जलमियो भामासा, राणा री पूरी मन आसा,
बो जोधो दुरगादास जबर, भिड़ लीन्ही दिल्ली स्यूं टक्कर,
जुग जुग में आगीवाण हुया, घर गळी गांव घमसान हुया,
पग पग पर जागी जोत अठै, मरणै स्यूं मधरी मौत अठै,
रूं रूं में छतरयां देवळ है, आ अमर जुझारां री थळ है,
हर एक खेजड़ै खेड़ा में, रोहीड़ा खींप कंकेड़ा में
मारू री गूंजी राग अठै, बलिदान हुया बेथाग अठै,
आ मायड़ संतां शूरां री, आ भोम बांकुरा वीरां री,
आ माटी मोठ मतीरां री, आ धूणी ध्यानी धीरां री,
आ साथण काचर बोरां री, आ मरवण लूआं लोरां री
आ धरती गोरा धोरां री, आ धरती मीठै मोरां री।
Saturday, 2 April 2016
आधुनिक सच
मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं
तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैं
सुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं
रात ग्यारह तक ही वापिस आते हैं
अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं
अकेले रह कर वह कैरियर बनाते हैं
कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं
भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं
मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं
अपने नन्हे मुन्ने को पाल नहीं पाते हैं
फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते हैं
उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते हैं
परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है
केवल आया'आंटी को ही पहचानता है
दादा -दादी, नाना-नानी कौन होते है?
अनजान है सबसे किसी को न मानता है
आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है
टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है
यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती है
छुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है
नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है
जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है
उसे सुलाने में अक्सर वो भी सो जाती है
कभी जब मचलता है तो टीवी दिखाती है
जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है
देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता है
वीक ऐन्ड पर मौल में पिकनिक मनाता है
संडे की छुट्टी मौम-डैड के संग बिताता है
वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है
वह स्कूल से निकल के कालेज में आता है
कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है
आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है
वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है
मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है
धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है
मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है
कुछ दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है
जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है
माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है
बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है
बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं
जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं
क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं
घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं
हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं
दाढ़- दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं
कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं
वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं
सोचना की बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो या विदेश की सेवा के लिए।
बेटा एडिलेड में, बेटी है न्यूयार्क।
ब्राईट बच्चों के लिए, हुआ बुढ़ापा डार्क।
बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार।
चिता जलाने बाप की, गए पड़ोसी चार।
ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार।
दुनियां छोटी हो गई, रिश्ते हैं बीमार।
बूढ़ा-बूढ़ी आँख में, भरते खारा नीर।
हरिद्वार के घाट की, सिडनी में तकदीर।
Monday, 28 March 2016
नर या नारी ; है कौन भारी ?
लंबी लगी कतारें ।
सभी आदमी खड़े हुए थे,
कहीं नहीं थी नारें ।
सभी नारियाँ कहाँ रह गई.
था ये अचरज भारी ।
पता चला ब्यूटी पार्लर में,
पहुँच गई थी सारी।
मेकअप की थी गहन प्रक्रिया,
एक एक पर भारी ।
बैठी थीं कुछ इंतजार में,
कब आएगी बारी ।
उधर विधाता ने पुरूषों में,
अक्ल बाँट दी सारी ।
ब्यूटी पार्लर से फुर्सत पाकर,
जब पहुँची सब नारी ।
बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है,
नहीं अक्ल अब बाकी ।
रोने लगी सभी महिलाएं ,
नींद खुली ब्रह्मा की ।
पूछा कैसा शोर हो रहा है,
ब्रह्मलोक के द्वारे ?
पता चला कि स्टॉक अक्ल का,
पुरुष ले गए सारे ।
ब्रह्मा जी ने कहा देवियों ,
बहुत देर कर दी है ।
जितनी भी थी अक्ल वो मैंने,
पुरुषों में भर दी है ।
लगी चीखने महिलायें,
ये कैसा न्याय तुम्हारा?
कुछ भी करो हमें तो चाहिए.
आधा भाग हमारा ।
पुरुषों में शारीरिक बल है,
हम ठहरी अबलाएं ।
अक्ल हमारे लिए जरुरी ,
निज रक्षा कर पाएं ।
सोच-सोच दाढ़ी सहलाकर,
तब बोले ब्रह्मा जी ।
एक वरदान तुम्हे देता हूँ ,
अब हो जाओ राजी ।
थोड़ी सी भी हँसी तुम्हारी ,
रहे पुरुष पर भारी ।
कितना भी वह अक्लमंद हो,
अक्ल जायेगी मारी ।
एक औरत ने तर्क दिया,
मुश्किल तो बहुत होती है।
हंसने से ज्यादा महिलायें,
जीवन भर रोती है ।
ब्रह्मा बोले यही कार्य तब,
रोना भी कर देगा ।
औरत का रोना भी नर की,
अक्ल सभी हर लेगा ।
एक अधेड़ बोली बाबा ,
हंसना रोना नहीं आता ।
झगड़े में है सिद्धहस्त हम,
खूब झगड़ना भाता ।
ब्रह्मा बोले चलो मान ली,
यह भी बात तुम्हारी ।
झगड़े के आगे भी नर की,
अक्ल जायेगी मारी ।
ब्रह्मा बोले सुनो ध्यान से,
अंतिम वचन हमारा ।
तीन शस्त्र अब तुम्हे दिए.
अब पूरा न्याय हमारा ।
इन अचूक शस्त्रों में भी,
जो मानव नहीं फंसेगा ।निश्चित समझो,
उसका घर इस जीवन में नहीं बसेगा ।
कहे कवि मित्र ध्यान से,
सुन लो बात हमारी ।
बिना अक्ल के भी होती है,
नर पर नारी भारी!
Sunday, 27 March 2016
जमाना बदल गया
🌳🐪🌾"गाँव री याद"🌾🐪🌳
गाँव रा गुवाड़ छुट्या, लारे रह गया खेत
धोरां माथे झीणी झीणी उड़ती बाळू रेत
उड़ती बाळू रेत , नीम री छाया छूटी
फोफलिया रो साग, छूट्यो बाजरी री रोटी
अषाढ़ा रे महीने में जद,खेत बावण जाता
हळ चलाता,बिज बिजता कांदा रोटी खाता
कांदा रोटी खाता,भादवे में काढता'नीनाण'
खेत मायला झुपड़ा में,सोता खूंटी ताण
गरज गरज मेह बरसतो,खूब नाचता मोर
खेजड़ी , रा खोखा खाता,बोरडी रा बोर
बोरडी रा बोर ,खावंता काकड़िया मतीरा
श्रादां में रोज जीमता, देसी घी रा सीरा
आसोजां में बाजरी रा,सिट्टा भी पक जाता
काती रे महीने में सगळा,मोठ उपाड़न जाता
मोठ उपाड़न जाता, सागे तोड़ता गुवार
सर्दी गर्मी सहकर के भी, सुखी हा परिवार
गाँव के हर एक घर में, गाय भैंस रो धीणो
घी दूध घर का मिलता, वो हो असली जीणो
वो हो असली जीणो,कदे नी पड़ता बीमार
गाँव में ही छोड़आया ज़िन्दगी जीणे रो सार
सियाळे में धूंई तपता, करता खूब हताई
आपस में मिलजुल रहता सगळा भाई भाई
कांई करा गाँव की,आज भी याद सतावे
एक बार समय बीत ग्यो,पाछो नहीं आवे
🙏🏻कृपा गाँव को याद करके रोना मत रोने से अच्छा है एक बार गाँव हो आना मन हल्का हो जायेगा और मन को सुकून मिलेगा. .
Friday, 25 March 2016
होली की बधाई
बरसाने बरसन लगी, नौ मन केसर धार ।
ब्रज मंडल में आ गया, होली का त्यौहार ।।
2
लाल हरी नीली हुई, नखरैली गुलनार ।
रंग-रँगीली कर गया, होली का त्यौहार ।।
3
आंखों में महुआ भरा, सांसों में मकरंद ।
साजन दोहे सा लगे, गोरी लगती छंद ।।
4
कस के डस के जीत ली, रँग रसिया ने रार ।
होली ही हिम्मत हुई, होली ही हथियार ।।
5
हो ली, हो ली, हो ही ली, होनी थी जो बात ।
हौले से हँसली हँसी, कल फागुन की रात ।।
6
होली पे घर आ गया, साजणियो भरतार ।
कंचन काया की कली, किलक हुई कचनार ।।
7
केसरिया बालम लगा, हँस गोरी के अंग ।
गोरी तो केसर हुई, साँवरिया बेरंग ।।
8
देह गुलाबी कर गया, फागुन का उपहार ।
साँवरिया बेशर्म है, भली करे करतार ।।
9
बिरहन को याद आ रहा, साजन का भुजपाश।
अगन लगाये देह में, बन में खिला पलाश ।।
10
साँवरिया रँगरेज ने, की रँगरेजी खूब ।
फागुन की रैना हुई, रँग में डूबम डूब।।
11
सतरंगी सी देह पर, चूनर है पचरंग ।
तन में बजती बाँसुरी, मन में बजे मृदंग ।।
12
जवाकुसुम के फूल से, डोरे पड़ गये नैन ।
सुर्खी है बतला रही, मनवा है बेचैन ।।
13
बरजोरी कर लिख गया, प्रीत रंग से छंद ।
ऊपर से रूठी दिखे, अंदर है आनंद ।।
14
होली में अबके हुआ, बड़ा अजूबा काम ।
साँवरिया गोरा हुआ, गोरी हो गई श्याम ।।
15
कंचन घट केशर घुली, चंदन डाली गंध ।
आ जाये जो साँवरा, हो जाये आनंद ।।
16
घर से निकली साँवरी, देख देख चहुँ ओर ।
चुपके रंग लगा गया, इक छैला बरजोर ।।
17
बरजोरी कान्हा करे, राधा भागी जाय ।
बृजमंडल में डोलता, फागुन है गन्नाय ।।
18
होरी में इत उत लगी, दो अधरन की छाप ।
सखियाँ छेड़ें घेर कर, किसका है ये पाप ।।
19
कैसो रँग डारो पिया, सगरी हो गई लाल ।
किस नदिया में धोऊँ अब, जाऊँ अब किस ताल ।।
20
फागुन है सर पर चढ़ा, तिस पर दूजी भाँग ।
उस पे ढोलक भी बजे, धिक धा धा, धिक ताँग ।।
21
हौले हौले रँग पिया, कोमल कोमल गात ।
काहे की जल्दी तुझे, दूर अभी परभात ।।
22
फगुआ की मस्ती चढ़ी, मनुआ हुआ मलंग ।
तीन चीज़ हैं सूझतीं ,रंग ,भंग और चंग
🌸🌺आप सभी अग्रज व अनुज भाईयों को मेरी ओर से सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनायें.
Saturday, 12 March 2016
विष्णु अवतार गुसाई महाराज
गुसाईंजी हिन्दुओं के देवता हैं। इनका एक प्रासिद्ध मंदिर नागौर जिले के जुन्जाला गाँव में स्थित है। यद्यपि गुसाईंजी हिन्दुओं के देवता हैं परन्तु मुसलमान भी इनको मानते हैं।
एक समय राजा बलि इस धरती पर राज करता था। राजा बलि ने अश्वमेघ यग्य और अग्नि होम किए. उसने इस तरह ९९ यज्ञ संपन्न कर दिए. राजा बलि का यश चारों और फैलने लगा और वह इन्द्रलोक का राजा बनने की सोचने लगा. राजा बलि ने १०० वें यज्ञ का आयोजन रखा और इसके लिए निमंन्त्रण भेजे. सारी नगरी को इस अवसर के अनुरूप सजाया गया। सारी नगरी को न्योता दिया गया।[1]
भगवान ने सोचा कि राजा बलि घमंड में आकर कहीं इन्द्र का राज न लेले. भगवान ने बावन अवतार का रूप धारण किया। अपना शरीर ५२ अंगुल के बराबर लंबा किया और राजा बलि की नगरी के समीप धूना जमा लिया। राजा बलि ने यज्ञ शुरू किया और मंत्रियों को हुक्म दिया कि नगरी के आस पास कोई भी मनुष्य यहाँ आए बिना न रहे. मंत्रियों ने छानबीन की तो पता चला कि भगवान रूप बावन अपनी जगह बैठा है। मंत्रियों के कहने पर वह नहीं आए. तब राजा बलि ने ख़ुद जाकर महाराज से निवेदन किया। महाराज ने राजा से कहा कि मैं आपके नगर में तब प्रवेश करुँ जब मेरे पास कम से कम तीन पांवडा (कदम) जमीन मेरे घर की हो. इस पर राजा बलि को हँसी आ गई और कहा की शर्त मंजूर है। [2]
राजा बलि का वचन पाकर भगवान ने अपनी देह को इतना लंबा किया कि पूरी पृथ्वी को दो पांवडा (कदम) में ही नाप लिया। और पूछा कि तीसरा कदम कहाँ रखू. इस पर राजा बलि घबरा गए और थर-थर कांपने लगे. राजा बलि ने कहा कि यह तीसरा कदम मेरे सर पर रखें. इस पर भगवान ने तीसरा पैर राजा बलि के सर पर रख कर उसको पाताल भेज दिया. [3]
कहते हैं कि जब भगवान ने वामन अवतार धारण कर पृथ्वी का नाप किया तो पहला कदम मक्का मदीना में रखा गया था। जहाँ अभी मुसलमान पूजा करते हैं और हज करते हैं। दूसरा कदम कुरुक्षेत्र में रखा था जहां अभी पवित्र नहाने का सरोवर है। तीसरा पैर ग्राम जुन्जाला के राम सरोवर के पास रखा जहाँ आज मन्दिर है। तीर्थ राम सरोवर में हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों के लोग आते हैं। हिंदू इसे गुसांईजी महाराज कहते हैं तो मुसलमान इसे बाबा कदम रसूल बोलते हैं। [4]
यह मन्दिर एतिहासिक दृष्टि से बहुत पुराना है। यहाँ पर हर साल एक तो नव रात्रा के पहले दिन चैत्र सुदी १ व २ को तथा दूसरा आसोज सुदी १ व २ को मेला लगता है। यहाँ राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से यात्री आते हैं। [5]
बाबा रामदेवजी के परिवार वाले भी यहाँ अपनी जात का जडूला चढाने जुन्जाला आया करते थे। यहाँ मन्दिर में एक पुराना जाल का पेड़ है जिसके नीचे बाबा रामदेवजी का जडूला उतरा हुआ है। इसलिए जो लोग रामदेवरा जाते थे वह सब यात्री जुंजाला आने पर ही उनकी यात्रा पूरी मानी जाती है। इसलिए भादवा और माघ के महीने में मेला लग जाता है।
Tuesday, 23 February 2016
अभिनेता संजय दत्त
जिस कि अभिनेता संजय दत्त 25 दिन अंदर तो 10 दिन बाहर करते करते जेल की सजा काट रहे है और अब अच्छे व्यवहार को देखते हुए 25 फ़रवरी को आजाद हो रहे है।
बेशक इसमे किसी को कोई आपत्ति नही लेकिन किसी गरीब को भी ऐसा मौका मिल जाये जो कम पढ़े लिखे या अपरिपक्व दिमाग के भी होते है ।संजय दत्त तो एक हाई फ़ाई पर्सन और बहुत बुद्धिमान आदमी भी है।
अगर गरीब जेल प्रशासन के नजर न चढ़े या वह प्रार्थना के लिए व्यय न कर सके तो सरकारो का भी यह कर्तव्य नहीं बनता कि उसे कानूनी सहायता उपलब्ध करवाये।
जिससे सभी को समानता का मेसेज जाये ।
सम्माननीय न्यायलय का आदेश सभी को स्वीकार्य है।
यह मात्र कानूनी पेचीदगी और हमारी संवेदना की बात है ।
Saturday, 6 February 2016
Thursday, 28 January 2016
श्री कृष्णा उपदेश
अबकी बार जब उसे हरी एवम् अर्जुन ने भीख मांगते देखा तो श्री कृष्ण ने उसे दो रूपये दिए ।अर्जुन भौचकै हो कर बोले भगवन मैंने दो बार इसकी दरिद्रता दूर करने के लिए उतना कुछ दिया तब भी कोई फर्क न्ही पडा और आप मात्र दो रूपये दे रहे है इससे क्या इसकी दरिद्रता दूर होगी ।
कृष्ण ने कहा इसके पीछे जाओ और देखते जाओ अर्जुन ने ऐसा ही किया । ब्राह्मण सोचता जा रहा था कि दो रूपये से क्या होगा ;एक समय का खाना भी नही खा सकेंगे ऐसा सोचता सोचता वह नदी पर पानी पीने चला गया तभी एक मछुआरा एक मछली पकड़ झोली में डालने लगा ।ब्राह्मण को दया आ गई और दो रूपये देकर मछली को मछुआरे से आजाद करवाया ।
ब्राह्मण मछली को नदी जल में छोड़ ही रहा था कि तड़पती मछली के मुख से वही मणि गिरी ।ब्राह्मण उसे देख चिल्लाया मिल गया मिल गया । तभी वही दोनों चोर भी नदी पर जल कार्य से आये हुए थे जो मिल गया मिल गया कि आवाज से घबरा गए कि ब्राह्मण उन्हें पहचान गया और सुबह राजा से शिकायत करेगा । दोनों चोर ब्राह्मण के पैर पकड़ माफ़ी मांग कर दो मोहरे लौटा देते है ।
अर्जुन ने यह सारा नजारा देख हरि को यह कथा बताई तो श्री कृष्णा बोले -----------
धन दौलत से नसीब नही बदलता ;नसीब को सोच ही बदल सकती है ।नेकी बदल सकती है जैसे दो बार ब्राह्मण ने धन स्वार्थ किया लेकिन तीसरी बार सोचा ये कुछ नहीं है, इससे थोडा नेक काम कर लूँ ।
वही नेकी ब्राह्मण का काम कर गई ।
Tuesday, 26 January 2016
देख कर ही सीखते है ।
उस घर के रीति रिवाज ढर्रा अभी भी सुधरा नहीं
उस बूढ़ी माँ को उसी बर्तन में खाना वही जिल्लत मिल रही थी ।छोटी बहू किसी संस्कारी पिता की औलाद थी ,वह यह दृश्य देख जाने कहाँ खो गई और एक नए संसार को देख रही थी कि मानव सभ्यता में ऐसा भी होता है ! फिर भी पिता के संस्कारों और छोटी हुँ ये सोचते हुए उसने यह चुगली(काना-फूसी) नहीँ की ।
समय फिर गुजरता गया और बूढी माँ का स्वर्गवास हो गया ।उसका बारहवा वगरैह भी हो गया ।अब पोते की बहू और उसकी सास में प्रेम वार्ता होने लगी कि बेटा ऐसा करना ,वैसा करना और हाँ वो बूढी दादी वाला मिट्टी का टुकड़ा बाहर गली में फैंक देना । छोटी बहू बोली क्यों सासु मां तो जवाब मिला कि दादी तो चली गई अब इसमे किसे खिलाना है ?
पोते की बहू ने मासूमियत से कहा सासु माँ कल आप भी बूढी होगी, खाट जकड़ लेगी---तब आपके यह बर्तन काम आएगा ।
सीख---बच्चों को वो करके दीखाओ जो हम उनसे चाहते हो ।
